मदन अरोड़ा.देश के अनेक शहरों में आज बुलडोजर की गूंज सुनाई दे रही है. दिल्ली के यमुना डूब क्षेत्र से लेकर मुंबई, हल्द्वानी, जयपुर और अन्य नगरों तक अवैध निर्माणों पर कार्रवाई हो रही है. कहीं झुग्गियाँ हटाई जा रही हैं, कहीं बहुमंजिला इमारतें तोड़ी जा रही हैं, कहीं रेलवे भूमि खाली कराई जा रही है. कानून का पालन आवश्यक है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन इससे बड़ा और अधिक गंभीर प्रश्न यह है कि ये अवैध बस्तियाँ, कॉलोनियाँ और निर्माण वर्षों तक कैसे फलते-फूलते रहे? जब पहली ईंट रखी जा रही थी, तब प्रशासन कहाँ था? जब एक झोपड़ी से पूरा मोहल्ला बन रहा था, तब निगरानी तंत्र क्यों मौन था?
यह केवल अतिक्रमण का प्रश्न नहीं है, यह शासन की विफलता, भ्रष्टाचार, मिलीभगत और जवाबदेही के अभाव का प्रश्न है. यदि किसी क्षेत्र में बिजली, पानी, सड़क, राशन, आधार, मतदाता पहचान पत्र, कर वसूली और नगर सेवाएँ उपलब्ध थीं, तो यह मानना कठिन है कि संबंधित विभागों को वहाँ बसावट की जानकारी नहीं थी. सच यह है कि अवैध निर्माण अक्सर अकेले भूमाफियाओं की देन नहीं होते. इनके पीछे स्थानीय तंत्र, राजनीतिक संरक्षण, विभागीय लापरवाही और कई बार खुली सांठगांठ होती है. जब तक जेबें गर्म रहती हैं, तब तक आंखें बंद रहती हैं और जब अदालत आदेश देती है, तब सबसे पहले गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर बुलडोजर चलता है.
यही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी त्रासदी है. जो लोग स्वयं भूमाफिया नहीं हैं, जिन्होंने जीवनभर की कमाई से छोटा-सा मकान, दुकान या भूखंड खरीदा है, वे भी ध्वस्तीकरण की चपेट में आ जाते हैं. उनके लिए यह केवल संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि जीवन की जमा पूंजी, बच्चों का भविष्य और सामाजिक सुरक्षा का अंत होता है. महिलाओं की चीखें, बच्चों का रोना और बुजुर्गों की बेबसी किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोर देने के लिए पर्याप्त है. इसलिए कानून का उद्देश्य केवल दंड नहीं, न्याय भी होना चाहिए.
जहाँ नदी की धारा, जलनिकासी, सार्वजनिक मार्ग, रेलवे सुरक्षा, राष्ट्रीय हित या पर्यावरण की रक्षा के लिए तत्काल कार्रवाई आवश्यक है, वहाँ कठोर कदम उठाए जाएँ. लेकिन जहाँ दशकों से लोग रह रहे हों, वहाँ केवल तोड़फोड़ समाधान नहीं हो सकता. वहाँ पुनर्वास, चरणबद्ध कार्रवाई, मानवीय दृष्टिकोण और वैकल्पिक व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए. न्यायालयों को भी यह समझना होगा कि लाखों लोगों को एक झटके में बेघर कर देना किसी स्थायी समाधान की ओर नहीं ले जाता. अवैध कब्जे हटाने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि भविष्य में ऐसा दोबारा न हो.
इसके लिए सबसे पहले जवाबदेही तय करनी
होगी.जिस सरकारी विभाग, रेलवे, नगर निकाय, विकास प्राधिकरण या अन्य सार्वजनिक संस्था की भूमि पर पहला अवैध कब्जा होता है, उसी समय संबंधित अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो केवल कब्जाधारी नहीं, बल्कि निरीक्षक, अभियंता, राजस्व अधिकारी, स्थानीय प्रशासन, पुलिस और संबंधित जनप्रतिनिधियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए. विभागीय जांच, सेवा से बर्खास्तगी, आर्थिक दंड और आवश्यकतानुसार आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए. जब तक संरक्षण देने वालों पर हाथ नहीं पड़ेगा, तब तक अतिक्रमण की जड़ नहीं कटेगी.
भूमाफियाओं, अवैध कॉलोनाइजरों, फर्जी पट्टे जारी करने वालों, मास्टर प्लान में अवैध परिवर्तन कराने वालों और राजनीतिक संरक्षण देने वालों की संपत्तियाँ जब्त की जानी चाहिए. उनसे प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था भी उसी से की जानी चाहिए. फ्लड ज़ोन, ग्रीन बेल्ट, सार्वजनिक भूमि और मास्टर प्लान से छेड़छाड़ करने वाले अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों पर कठोर कारावास, लोकसेवा से प्रतिबंध और अवैध अर्जित संपत्ति की जब्ती का प्रावधान होना चाहिए. यह तभी संभव है जब कानून केवल कागज पर नहीं, व्यवहार में भी कठोर हो.
रेलवे, नगर निकाय, विकास प्राधिकरण और अन्य सभी सरकारी संस्थानों में ड्रोन सर्वेक्षण, उपग्रह मानचित्रण और डिजिटल निगरानी प्रणाली लागू की जानी चाहिए. पहला अवैध निर्माण होते ही उसे रोका जाए. यदि शुरुआती चरण में ही कार्रवाई हो जाए, तो न कॉलोनी बनेगी, न बस्ती, न बाद में हजारों परिवारों को उजड़ना पड़ेगा. तकनीक का उपयोग केवल रिकॉर्ड रखने के लिए नहीं, बल्कि जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भी होना चाहिए.
भारत को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें न भूमाफिया बचें, न भ्रष्ट अधिकारी बचें और न ही निर्दोष नागरिक की जीवनभर की कमाई अनियंत्रित कार्रवाई की भेंट चढ़े. यही न्यायपूर्ण शासन है, यही संवेदनशील नेतृत्व है और यही “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” की वास्तविक परीक्षा भी है. ध्वस्तीकरण अंतिम उपाय हो सकता है, पहला नहीं. पहले रोकथाम हो, फिर जवाबदेही तय हो, और अंत में ही कार्रवाई हो.
अब समय आ गया है कि देश एक राष्ट्रीय स्तर की मानवीय, न्यायसंगत और जवाबदेही आधारित नीति बनाए. अदालतों, सरकारों और प्रशासन को मिलकर ऐसा ढाँचा तैयार करना होगा जिसमें अवैध निर्माण की शुरुआत ही रोकी जाए, दोषियों को दंड मिले और निर्दोषों को संरक्षण. बुलडोजर से समस्या का समाधान नहीं होता, यदि उसके पीछे खड़े भ्रष्ट तंत्र को नष्ट न किया जाए. असली लड़ाई झोपड़ी या मकान से नहीं, उस व्यवस्था से है जो अवैध निर्माण को जन्म देती है, पालती है और फिर अंत में गरीब पर ही गिर पड़ती है.
देश को अब ध्वस्तीकरण नहीं, न्याय चाहिए. कार्रवाई भी हो, लेकिन मानवीयता के साथ. कानून भी चले, लेकिन जवाबदेही के साथ. तभी शहर सुरक्षित होंगे, पर्यावरण बचेगा, और नागरिकों का भरोसा भी कायम रहेगा.