चार खेमों में बंटता चुनाव, भाजपा-कांग्रेस की सूची से पहले ही गर्म हुआ माहौल; परिवारवाद, बाहरी उम्मीदवार, दलबदल और धनबल के बीच जेन ज़ी के सामने पांच साल की जवाबदेही का है सवाल.
मदन अरोड़ा.स्थानीय निकाय चुनाव इस बार केवल पार्षद चुनने का चुनाव नहीं रह गया है. यह पुरानी सियासी कार्यशैली और नई पीढ़ी की बदलती राजनीतिक सोच के बीच मुकाबला बनता दिखाई दे रहा है. शहर में चुनावी सरगर्मी बढ़ रही है और उसके साथ राजनीतिक बेचैनी भी.
यह बेचैनी चुनाव जीतने की इच्छा से ज्यादा हार की आशंका से जुड़ी दिखाई देती है. कुछ पुराने चेहरे अपना वार्ड छोड़कर दूसरे वार्डों में पहुंच गए हैं. जहां पांच साल तक राजनीति की, वहां अब परिस्थितियां अनुकूल नहीं दिखीं तो नए वार्ड में राजनीतिक भविष्य तलाशने की कोशिश हो रही है.
चेहरे पुराने हैं, वादे पुराने हैं, लेकिन इस बार सियासी परिवारों की अगली पीढ़ी के चेहरे भी मैदान में उतर आए हैं. पत्नी, बेटी और रिश्तेदारों की राजनीतिक भागीदारी ने परिवारवाद की बहस को भी हवा दे दी है.
और इसी चुनाव में एक नया फैक्टर उभर रहा है-जेन ज़ी.
. चार खेमों में बंटता चुनाव
फिलहाल चुनावी तस्वीर चार प्रमुख धाराओं में दिखाई दे रही है. पहला खेमा भाजपा का.दूसरा कांग्रेस का. तीसरा निर्दलीय विधायक गणेश राज बंसल का राजनीतिक खेमा. चौथा खेमा माकपा, आम आदमी पार्टी और टिकट न मिलने या अपने राजनीतिक हितों के कारण निर्दलीय मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों का.
निर्दलीय विधायक की ओर से करीब - करीब उम्मीदवारों के नाम सामने आ चुके हैं. इनमें विधायक की पत्नी संतोष बंसल वार्ड 17 से, बेटी सोनू गणेश राज वार्ड 11 से, पूर्व सभापति सुमित रिणवा वार्ड 7 से और उनकी पत्नी मंजू रिणवा वार्ड 13 से चुनाव मैदान में हैं.
भाजपा और कांग्रेस की अधिकृत सूची अभी सामने नहीं आई है. इनके एक दो रोज में आना संभावित है.इसलिए वास्तविक मुकाबले की तस्वीर दोनों दलों की सूची आने के बाद ही पूरी तरह साफ होगी.
लेकिन इतना तय है कि चुनाव बहुकोणीय होने जा रहा है और कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार मुकाबले का गणित बदल सकते हैं.
.भाजपा-कांग्रेस की सूची आएगी और बदलेगा विधायक खेमे का गणित?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा और कांग्रेस की अधिकृत सूची जारी होने के बाद निर्दलीय विधायक के खेमे की चुनावी रणनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
कई ऐसे उम्मीदवार, जिन्हें फिलहाल विधायक खेमे की ओर से आगे बढ़ाया गया है, उनकी स्थिति भाजपा और कांग्रेस की सूची आने के बाद बदल सकती है. कुछ उम्मीदवारों को हटाया जा सकता है और उनकी जगह
कुछ नए चेहरे मैदान में उतारे जा सकते हैं. और राजनीतिक चर्चा तो यहां तक है कि कुछ पूर्व पार्षदों की उम्मीदवारी पर भी गाज गिर सकती है.
इसका कारण केवल चुनावी जीत-हार का गणित नहीं, बल्कि यह भी बताया जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवार सामने आने के बाद प्रत्येक वार्ड में मुकाबले की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा.
यदि किसी वार्ड में विधायक खेमे का घोषित उम्मीदवार कमजोर दिखाई देता है तो वहां नया चेहरा उतारने की कोशिश हो सकती है. इसी तरह किसी मजबूत दावेदार को किसी दूसरे वार्ड में भेजने या निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने की रणनीति भी अपनाई जा सकती है.
हालांकि ये अभी राजनीतिक चर्चाएं हैं. अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों की अधिकृत सूची और नामांकन के बाद ही स्पष्ट होगी.
लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा और कांग्रेस की सूची आने के बाद विधायक खेमे के भीतर टिकट और उम्मीदवारों को लेकर हलचल बढ़ सकती है.
. दलबदलुओं को टिकट या निष्ठावान कार्यकर्ताओं को अवसर?
भाजपा के भीतर दलबदल करने वाले कुछ पूर्व पार्षदों को फिर टिकट दिए जाने की संभावित कोशिशों ने पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं के बीच सवाल खड़े किए हैं.
सवाल है -जो व्यक्ति निजी राजनीतिक हित में पार्टी छोड़ सकता है, उसके जीतने के बाद पार्टी के साथ खड़े रहने की गारंटी क्या है?
यदि केवल चुनाव जीतने की संभावना के आधार पर दलबदलू को टिकट दिया जाता है तो वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता के मन में स्वाभाविक सवाल उठेगा, फिर निष्ठा की कीमत क्या है?
प्रदेश भाजपा नेतृत्व के हालिया निर्णयों से ऐसे कार्यकर्ताओं को उम्मीद जरूर बंधी है कि टिकट वितरण में स्थानीयता, निष्ठा, संगठन के प्रति समर्पण और युवा चेहरों को प्राथमिकता मिल सकती है.लेकिन असली परीक्षा अब टिकट वितरण के समय होगी.
. रणनीति चाहे जितनी हो, अंतिम फैसला वोटर करेगा
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा और कांग्रेस की महिला उम्मीदवारों को कमजोर करने के लिए कुछ वार्डों में विधायक खेमे की ओर से अधिक निर्दलीय उम्मीदवार उतारे जा सकते हैं.
वार्ड 30, 23, 42 और 18 जैसे वार्डों को लेकर चर्चाएं इसी संदर्भ में हैं.
लेकिन चुनावी रणनीति बनाने वाले भूल जाते हैं कि मतदाता भी रणनीति समझता है.
यदि एक वार्ड में अचानक बहुत सारे उम्मीदवार खड़े होते हैं तो मतदाता यह सवाल भी पूछ सकता है-
इतने उम्मीदवार अचानक क्यों? किसका वोट काटने के लिए? किसे फायदा पहुंचाने के लिए? और किसे रोकने के लिए? राजनीति में गणित बहुत कुछ तय करता है, लेकिन अंततः वोटर का विवेक किसी भी गणित को उलट सकता है.
. जेन ज़ी पूछ रही है,चेहरा नया चाहिए या सिर्फ नारा नया?
शहर के लगभग 1.32 लाख मतदाताओं में करीब 26 हजार जेन ज़ी मतदाताओं की मौजूदगी चुनाव के परिणामों पर असर डाल सकती है.
यह पीढ़ी केवल यह नहीं पूछेगी कि उम्मीदवार किस पार्टी से है.
वह पूछेगी-पांच साल में किया क्या? वार्ड में कितनी बार दिखाई दिए? समस्या लेकर गए तो समाधान हुआ या केवल आश्वासन मिला? विकास के नाम पर कितना पैसा खर्च हुआ? और उसका हिसाब कहां है?
यही सवाल इस चुनाव को पुराने चुनावों से अलग कर सकते हैं.
. बाहरी उम्मीदवार बनाम वार्ड का अपना चेहरा
इस चुनाव में 'बाहरी उम्मीदवार' का मुद्दा भी तेजी से उभर रहा है. जिसने पांच साल एक वार्ड में राजनीति की और चुनाव आते ही दूसरे वार्ड में पहुंच गया, उससे नया वार्ड के मतदाता और स्थानीय उम्मीदवार सवाल खड़े कर रहे हैं - पुराना वार्ड क्यों छोड़ा? यदि आपने पांच साल अपने पुराने वार्ड में काम किया था तो वहां से चुनाव लड़ने में परेशानी क्या थी? और यदि वहां की जनता का भरोसा आपके साथ नहीं रहा तो नए वार्ड की जनता आप पर भरोसा क्यों करे? आरक्षण या परिसीमन के कारण वार्ड बदलना अलग बात है, लेकिन राजनीतिक सुविधा के लिए वार्ड बदलना मतदाता के सवालों से बच नहीं सकता.
जेन ज़ी के लिए उम्मीदवार का सबसे महत्वपूर्ण परिचय यही होगा कि वह चुनाव के पहले नहीं, चुनाव के बाद भी वार्ड में उपलब्ध रहता है या नहीं.
. परिवारवाद का सवाल भी लौटकर आया सामने
विधायक गणेश राज बंसल की पत्नी संतोष बंसल और बेटी सोनू गणेश राज के चुनाव मैदान में उतरने के बाद परिवारवाद पर चर्चा स्वाभाविक है.राजनीति में परिवार के किसी सदस्य को चुनाव लड़ाना किसी व्यक्ति का राजनीतिक अधिकार हो सकता है, लेकिन मतदाता को यह पूछने का अधिकार भी है कि क्या पार्टी और संगठन में काम करने वाले दूसरे कार्यकर्ताओं को अवसर नहीं मिलना चाहिए? विधानसभा चुनाव में परिवारवाद को लेकर जिन नेताओं पर सवाल उठाए गए थे, वही सवाल अब राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ वापस सामने हैं.
सियासत में आरोप कभी स्थायी नहीं रहते. समय घूमता है और सवाल पूछने वाला कभी-कभी खुद सवालों के घेरे में आ जाता है.
. जेन ज़ी पूछेगी, विकास हुआ या विकास के नाम पर किसी का विकास?
हर उम्मीदवार विकास का दावा करेगा. लेकिन इस बार विकास शब्द को केवल भाषण से स्वीकार करने के बजाय उसका हिसाब मांगने की जरूरत है. काम कितना हुआ? कितने में हुआ? काम की गुणवत्ता कैसी रही? किस वार्ड को कितना मिला? और जनता को खर्च का पूरा हिसाब क्यों नहीं दिया गया?
पिछले बोर्ड में हुए काम और खर्च का सार्वजनिक हिसाब मांगना मतदाता का अधिकार है.
पूर्व सभापति हों या पूर्व पार्षद, जिसने पांच साल जनता का प्रतिनिधित्व किया है, उससे पांच साल का हिसाब मांगना लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया और अधिकार भी है.
. बोर्ड किसका नहीं, बोर्ड कैसा?
राजनीतिक चर्चाओं में विधायक खेमे के 15-16 पार्षद जीतने और 31 के लक्ष्य की बातें हो रही हैं. कुछ राजनीतिक चर्चाओं में बहुमत पूरा करने के लिए चुनाव के बाद निर्दलीय पार्षदों को साथ लाने की संभावनाओं का भी उल्लेख हो रहा है. लेकिन मतदाता को इस गणित से ऊपर उठना होगा. बोर्ड किसका बनेगा? से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है, बोर्ड कैसा बनेगा? क्या बोर्ड जनता के प्रति जवाबदेह होगा? क्या पार्षद पांच साल वार्ड में उपलब्ध रहेगा? क्या नगर परिषद के खर्च का हिसाब सार्वजनिक होगा? क्या विकास कार्यों में पारदर्शिता होगी?
यदि इन सवालों का जवाब हां है तो बोर्ड किसी का भी हो, शहर का होगा.
. धनबल के मुकाबले मतदाता की ताकत
चुनावी चर्चाओं में इस बार भी बड़े पैमाने पर धनबल के इस्तेमाल की संभावनाएं जताई जा रही हैं. यदि कोई उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए भारी पैसा खर्च करता है तो मतदाता को यह सवाल जरूर पूछना चाहिए -
इस पैसे की भरपाई कहां से होगी?
वोट बेचने वाला केवल अपना एक वोट नहीं बेचता.
वह अगले पांच साल की अपनी आवाज कमजोर करता है.आज का छोटा लाभ कल नगर परिषद के बड़े फैसलों पर असर डाल सकता है. यही वह संदेश है जिसे जेन ज़ी और आम मतदाता तक पहुंचाने की जरूरत है.
. जेन ज़ी का मूड बदला तो पुराने समीकरण भी बदलेंगे
नई पीढ़ी केवल भाषण नहीं सुनती. वह सवाल करती है, रिकॉर्ड देखती है, पुराने बयान खोजती है और नेताओं के राजनीतिक सफर की तुलना करती है.
किसने कब किसका साथ दिया? किसने पार्टी कब छोड़ी?
कौन चुनाव से पहले किसके साथ था और चुनाव के बाद किसके साथ गया? किसने पांच साल वार्ड में काम किया?
और कौन केवल चुनाव के समय दिखाई दिया?
इसलिए इस बार पोस्टर और प्रचार से ज्यादा महत्वपूर्ण विश्वसनीयता होगी.
. भाजपा और कांग्रेस की भी अग्निपरीक्षा
भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अवसर है कि वे समर्पित, ईमानदार, युवा और स्थानीय चेहरों को आगे लाएं. यदि दोनों दल एक स्पष्ट और पारदर्शी बोर्ड का भरोसा देते हैं, पांच साल की जवाबदेही स्वीकार करते हैं और उम्मीदवारों के चयन में निष्ठा तथा स्थानीयता को प्राथमिकता देते हैं तो वे मतदाता के सामने मजबूत विकल्प रख सकते हैं.
लेकिन यदि पुराने समीकरण, सिफारिश, प्रभाव और अवसरवाद हावी हुए तो बदलाव की तलाश में निकला मतदाता तीसरा रास्ता भी चुन सकता है.
. जेन ज़ी के सामने पांच साल का फैसला
मतदाता को इस चुनाव में केवल यह नहीं देखना कि कौन जीत सकता है. यह भी देखना है कि जीतने के बाद कौन जनता के काम आएगा. अपने उम्मीदवार से पूछना होगा - आप वार्ड में कितने उपलब्ध रहेंगे? आपकी पहली पांच प्राथमिकताएं क्या होंगी? नगर परिषद के खर्च में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित करेंगे? आप जनता के प्रति जवाबदेह कैसे रहेंगे? और पांच साल बाद अपना पूरा हिसाब देने के लिए तैयार हैं या नहीं?
जो उम्मीदवार इन सवालों का जवाब देने से बचता है, उससे सवाल और ज्यादा पूछने होंगें.
. वोट आपका है, भविष्य भी आपका
स्थानीय निकाय चुनाव का मतलब केवल एक पार्षद चुनना नहीं है. यह तय करना है कि अगले पांच वर्षों में आपके वार्ड की आवाज कौन बनेगा. इसलिए फैसला जाति, रिश्तेदारी, दबाव, धनबल या चमकदार प्रचार देखकर नहीं, उम्मीदवार की नीयत और पिछले रिकॉर्ड देखकर कीजिये. जो अपना वार्ड बदलकर आया है, उससे कारण पूछिए. जो पांच साल बाद दिखाई दिया है, उससे पांच साल की अनुपस्थिति का कारण पूछिए.
जो पैसा खर्च कर रहा है, उससे पूछिए कि उस खर्च की कीमत जनता से कैसे वसूली जाएगी. जो परिवार के कई सदस्यों को राजनीति में उतार रहा है, उससे पूछिए कि संगठन के दूसरे कार्यकर्ताओं की बारी कब आएगी.
और जो विकास की बात कर रहा है, उससे भी पूछना होगा - विकास कितना हुआ और हिसाब कहां है? इस बार चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बोर्ड किसका बनेगा.
सबसे बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए- बोर्ड जनता का होगा या नेताओं का? और यह जेन ज़ी ही कर सकता है.
क्योंकि जेन ज़ी केवल नई पीढ़ी नहीं है, वह पुराने राजनीतिक तौर-तरीकों से जवाब मांगने वाली पीढ़ी भी बन सकती है.
इसलिए वोट को चंद सिक्कों में मत बेचिए.सवाल पूछिए. हिसाब मांगिए.उम्मीदवार को परखिए.फिर वोट दीजिए. क्योंकि चुनाव एक दिन का होता है, लेकिन उसका असर पांच साल रहता है.
इस बार चेहरा नहीं, चरित्र चुनिए.वादे नहीं, काम चुनिए.
प्रचार नहीं, जवाबदेही चुनिए.
और यदि जेन ज़ी ने सचमुच अपना फैसला खुद लिख दिया तो संभव है कि इस बार केवल पार्षद न बदलें, शहर की सियासत का मिजाज भी बदल जाए.