हनुमानगढ़


मदन अरोड़ा.राजस्थान की राजनीति में वर्ष 2023 विधानसभा चुनाव एक निर्णायक मोड़ लेकर आया. लंबे समय तक राज्य की राजनीति दो बड़े चेहरों-अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे-के इर्द-गिर्द घूमती रही थी. लेकिन 2023 में भाजपा ने एक ऐसा चेहरा चुना, जिसकी न तो बड़े पैमाने पर मीडिया में चर्चा थी और न ही जनता के बीच पारंपरिक लोकप्रियता, वो चेहरा थे भजनलाल शर्मा. एक साधारण परिवार से आने वाले, संगठन में गहरी पकड़ वाले और विचारधारा के प्रति कटिबद्ध भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाना भाजपा की तरफ से एक संकेत था कि पार्टी राजस्थान में “नई पीढ़ी का नेतृत्व” और “शांत-ईमानदार प्रशासन” की नई परंपरा स्थापित करना चाहती है. अब जब इस सरकार के दो वर्ष पूरे होने को हैं, तब यह सवाल स्वाभाविक है- क्या भजनलाल सरकार राजस्थान को वह दिशा दे पाई है जिसकी अपेक्षा जनता ने की थी? और यह भी- क्या भाजपा के संगठन और कार्यकर्ताओं में इस नेतृत्व के समर्थन और विश्वास का स्तर वही है, जैसा दो वर्ष पहले था? प्रस्तुत है दो वर्षों का गहन विश्लेषण -उपलब्धियाँ, कमियाँ, जनता की धारणा, संगठन की स्थिति, सत्ता-संगठन में तालमेल, और आने वाली चुनौतियाँ. शासन और नेतृत्व शैली: शांत, संयमी, लेकिन क्या पर्याप्त? भजनलाल शर्मा की नेतृत्व शैली उनके पूर्ववर्ती अशोक गहलोत से बिल्कुल भिन्न है. गहलोत जहाँ प्रशासन में गहरी पकड़, अनुभवी रणनीति और त्वरित निर्णय लेने के लिए जाने जाते थे, वहीं भजनलाल “संगठन मूल्यों, टीमवर्क और शांत स्वभाव” के आधार पर नेतृत्व करते हैं..मुख्यमंत्री के इन गुणों से सरकार की स्थिरता है. लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से यह भी उतना ही सच है कि ईमानदारी नेतृत्व का आधार है, पर राजस्थान जैसा राज्य केवल ईमानदारी से नहीं चल सकता. यहां निर्णायक नेतृत्व, त्वरित निर्णय और राजनीतिक प्रतिबंधन भी उतना ही आवश्यक है. सकारात्मक पक्ष * मुख्यमंत्री की छवि “ईमानदार, सरल और संयमी” नेता की बनी. * मीडिया विवादों से दूरी, और अनावश्यक बयानबाज़ी से परहेज़. * प्रशासनिक तंत्र में अनुशासन और शांत माहौल .नकारात्मक पक्ष प्रशासनिक पकड़ कमजोर त्वरित निर्णय लेने में कमजोर राजनीतिक प्रबंधन की कमजोरी कार्यकर्ताओं और जनता में भाजपा शासन का अहसास कराने में विफल एक कुशल और कठोर प्रशासक की छवि बनाने में विफल जनता के दृष्टिकोण से बहुत से लोगों की राय यह है कि- “सीएम भ्रष्ट नहीं, शांत हैं, पर तेज़ी और राजनीतिक पकड़ थोड़ी कम महसूस होती है.” नेतृत्व की यह शैली विश्वसनीयता तो बढ़ाती है, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा वाले राज्य में गति भी उतनी ही ज़रूरी है. भ्रष्टाचार पर जीरो-टॉलरेंस: नीयत स्पष्ट, लेकिन प्रणाली जटिल दो वर्षों में सरकार ने भ्रष्टाचार पर कड़ी नीयत दिखाई. ए सी बी ने कई बड़े ट्रैप ऑपरेशन किए-पटवारी, जेईएन, इंजीनियर, नर्सिंग कर्मचारी, नगरपालिका अधिकारी तक रंगे हाथों पकड़े गए. एक विधायक को भी धरा गया. सरकार के कदम * विभागीय फाइल सिस्टम का डिजिटलीकरण. * संदेहास्पद ठेकों की समीक्षा. * लोकसेवा वितरण में समयबद्धता का प्रयास. * खनन, नगर निकाय, जैसे भ्रष्ट क्षेत्रों में निगरानी.इससे ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार पर कुछ नकेल कसी. लेकिन कमियाँ भी स्पष्ट * थाने और तहसील स्तर पर भ्रष्टाचार अभी भी सबसे बड़ा मुद्दा है. * कुछ विभाग—खासकर नगर निगम, खनन और राजस्व-अभी भी प्रणालीगत भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हुए. * जनता का सीधा अनुभव यह है कि “रफ्तार कम हुई है, पर प्रणाली अभी भी दुरुस्त नहीं.” * भ्रष्ट जनप्रतिनधियों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए मिल रहे संरक्षण मुख्यमंत्री की भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टोलरेंस पर सवाल खड़े करता है.बयानबाजी कम धरातल पर अधिक कार्रवाई की जरूरत. लेकिन यह लड़ाई लंबी है और इसके लिए संरचनागत सुधारों की आवश्यकता है. कानून-व्यवस्था: सुधार के संकेत, लेकिन चुनौतियाँ बरकरार गहलोत सरकार के अंतिम वर्षों में बढ़ते गैंगवार, पेपर लीक और साइबर अपराधों ने राज्य को चिंतित कर दिया था. भजनलाल सरकार ने आते ही इस क्षेत्र पर जोर दिया. उपलब्धियाँ * कई बड़े गैंगों के खिलाफ कार्रवाई. * संगठित अपराध पर अलग-अलग जिलों में सख्ती. * साइबर पुलिस स्टेशन का विस्तार. * पेपर लीक रोकने के लिए नए सुरक्षा प्रावधान. चुनौतियाँ * सीमावर्ती जिलों में ड्रग्स, हथियार और तस्करी अभी भी बड़ी समस्या. * साइबर अपराध में तेजी से हो रहा विस्तार. * कुछ जिलों में गैंग आधारित अपराध अभी भी चिंता पैदा करते हैं. कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ है, पर इसे “उत्कृष्ट” नहीं कहा जा सकता. बेरोजगारी-सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा राजस्थान की सबसे गंभीर समस्या बेरोजगारी है. युवा वर्ग गहलोत सरकार में पेपर लीक और भर्ती देरी से परेशान था, और भाजपा ने इसे मुद्दा बनाकर सत्ता पाई. भजनलाल सरकार ने भर्ती प्रक्रियाएँ शुरू कीं, लेकिन- युवाओं की शिकायतें * कई भर्तियाँ समय पर पूरी नहीं हो पा रहीं. * परीक्षा प्रणाली पर युवाओं का भरोसा अभी पूरी तरह बहाल नहीं. * निजी सेक्टर में रोजगार अवसर सीमित. * औद्योगिक विकास की गति धीमी होने से नौकरी सृजन कम. युवा मानते हैं कि सरकार की नीयत ठीक है, लेकिन परिणाम उतने तेज़ नहीं. बुनियादी ढांचा: केंद्र की मदद से बड़ी प्रगति सड़क और रेल परियोजनाएँ भजनलाल सरकार की सबसे मजबूत उपलब्धियों में शामिल हैं. सड़क विकास * राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति. * बीकानेर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और जयपुर क्षेत्रों में नई सड़कें एवं हाईवे विस्तार. * दुर्गम और पहाड़ी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए पुल और बाईपास का निर्माण. रेल कनेक्टिविटी * नई लाइनों और डबलिंग परियोजनाओं पर तेजी. * केंद्र-राज्य समन्वय से कई लंबे समय से लंबित काम शुरू. शहरी ढांचा * जलापूर्ति योजनाओं में सुधार. * स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को गति. * बिजली ढांचे के आधुनिकीकरण पर काम. इंफ्रास्ट्रक्चर मोर्चे पर सरकार को “अच्छा” से “बहुत अच्छा” कहा जा सकता है. शिक्षा और स्वास्थ्य: विस्तार, लेकिन गुणवत्ता की चुनौती शिक्षा क्षेत्र * कई नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणा. * स्कूलों में क्लस्टर मॉडल का विस्तार. * कॉलेजों में फैकल्टी की कमी को भरने के प्रयास. स्वास्थ्य क्षेत्र * जिला अस्पतालों का अपग्रेडेशन. * मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार. * दवाइयों की उपलब्धता में वृद्धि. लेकिन गुणवत्ता और विशेषज्ञ संसाधनों की कमी अभी भी बड़ी समस्या है- विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता सरकार की चुनौती बनी हुई है. किसानों की स्थिति: राहत तो मिली, लेकिन समाधान नहीं सरकार के प्रयास * सिंचाई परियोजनाओं पर काम और नहरी क्षेत्रों में सुधार. पर अपेक्षित नहीं * बिजली ढांचे के आधुनिकीकरण. * कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने की पहल. परंतु किसान अभी भी परेशान * महंगाई बढ़ी है. * फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा. * डीजल-पानी-बिजली के खर्च में वृद्धि * कृषि उत्पादन लागत बढ़ने से किसानों की आय पर असर. किसानों के लिए सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं माने जा रहे. सरकार में सिंचाई और इससे जुड़ी परियोजनाओं की समझ रखने वाला कोई चेहरा नहीं. मौजूदा सिंचाई मंत्री सुरेश सिंह रावत समस्याओं को समझ उनके समाधान में नाकाम. भाजपा के पास एक अनुभवी, सिंचाई और सिंचाई परियोजनाओं की बारीकी से समझ रखने वाला एक बड़ा चेहरा पूर्व सिंचाई मंत्री डॉक्टर राम प्रताप के रूप में हैं. उनकी सिंचाई की हर नब्ज पर पकड़ है. पर उनकी अनदेखी की जा रही है. राजस्थान में सिंचाई एक बड़ा मुद्दा है. प्रदेश में किसान किसी भी सरकार को बदलने की ताकत रखते हैं. ऐसे में सिंचाई को लेकर सरकार की उपेक्षा उसके लिए बड़ी समस्या बन सकती है. उद्योग और निवेश: नीतिगत प्रगति, पर धरातल पर धीमी रफ्तार सरकार ने निवेश आकर्षित करने के लिए- * सिंगल विंडो सिस्टम, * नई औद्योगिक नीति, * सेक्टर-विशेष क्लस्टर, जैसे कदम उठाए हैं. लेकिन राजस्थान अब भी गुजरात और महाराष्ट्र की बराबरी नहीं कर पा रहा. रुकावटें * भूमि आवंटन में देरी * बिजली टैरिफ की जटिलताएँ * लॉजिस्टिक लागत अधिक * कौशलयुक्त कार्यबल की कमी राजस्थान में औद्योगिक विकास की आधारशिला मौजूद है, लेकिन विस्तार की गति और तेजी मांगती है. महिला सुरक्षा और कल्याण राजस्थान में महिला सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा है. भजनलाल सरकार ने- * फास्ट ट्रैक कोर्ट * वन स्टॉप सेंटर * हेल्पलाइन * मिशन शक्ति कार्यक्रम जैसे उपाय लागू किए हैं. परंतु… जनता की धारणा यह है कि-“सुरक्षा में सुधार हुआ है, लेकिन भय खत्म नहीं हुआ.” मुख्य चुनौती व्यवहारिक और सामाजिक स्तर की है. सामाजिक सद्भाव और राजनीति राजस्थान की विविध सामाजिक संरचना में साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखना सरकारों के लिए चुनौती रहा है. सरकार के कदम * अवैध कब्जों पर कार्रवाई. * धार्मिक स्थानों के अवैध विस्तार पर जांच. * कानून-व्यवस्था को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने का प्रयास. * धर्मातंरण विरोधी कानून जनता की मिली-जुली प्रतिक्रिया * कुछ लोग इसे “कानून का राज” मानते हैं, * जबकि विपक्ष इसे “सिलेक्टिव टार्गेटिंग” बताता है. यह विषय अभी भी राजनीतिक तौर पर संवेदनशील है. सरकार और संगठन में तालमेल भजनलाल का संगठन में सम्मान है, लेकिन- आंतरिक चुनौतियाँ * टिकट वितरण को लेकर असंतोष. * कुछ मंत्रियों की कार्यशैली पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी. * संगठन-सरकार समन्वय में कमी. कार्यकर्ताओं में यह भावना भी दिखाई देती है कि -“सरकार में गियर बढ़ाने की जरूरत है.”कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे. इसलिए उनमें काफी निराशा और नाराजगी है. अब आगे जनता की अपेक्षाएँ भजनलाल सरकार से जनता को अब- 1. तेज़ और दृश्यमान विकास कंक्रीट परिणाम दिखें, कागजी योजनाएँ नहीं. 2. बेरोजगारी पर निर्णायक सुधार भर्ती कैलेंडर और निजी क्षेत्र में निवेश. 3. कस्बों-गाँवों की अर्थव्यवस्था मजबूत करना स्थानीय रोजगार, कृषि उद्योग, ग्रामीण ढांचा. 4. पारदर्शी और तेज़ प्रशासन थाने-तहसील स्तर की भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था. 5. महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा अपराध रोकने के लिए मजबूत तंत्र. 6. किसान-केंद्रित नीतियाँ उचित एम एस पी, सिंचाई, मंडी सुधार. 7.भ्रष्टाचार पर पूरी तरह लगाम. बयानबाजी कम, कार्रवाई ज्यादा 8.भ्रष्टाचार के आरोपी विधायकों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई. दो वर्षों का मूल्यांकन बताता है कि भजनलाल सरकार- * ईमानदार * शांत * स्थिर * भ्रष्टाचार के खिलाफ स्पष्ट नीयत वाली * इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करने वाली सरकार है. लेकिन- * बेरोजगारी * महंगाई * ग्रामीण अर्थव्यवस्था * प्रशासनिक सुस्ती * संगठन-सरकार का तालमेल * इंडस्ट्रियल ग्रोथ जैसे गंभीर मोर्चों पर “तेजी और दृढ़ता” की आवश्यकता है. यदि सरकार अगले तीन वर्षों में गति बढ़ाती है, तो भजनलाल शर्मा राजस्थान की राजनीति में एक मजबूत, सादगीपूर्ण और ईमानदार मुख्यमंत्री के रूप में स्थायी छाप छोड़ सकते हैं. अन्यथा जनता का धैर्य उसी गति से समाप्त भी हो सकता है जिस गति से उम्मीदें पैदा हुई थी.
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बॉलीवुड के बीते जमाने के स्टार जीतेंद्र आज 82 साल के हो गए। तकरीबन चार दशक लंबे करियर में जीतेंद्र ने 'तोहफा', 'हिम्मतवाला', 'कारवां', 'परिचय', 'मवाली' समेत कई हिट फिल्मों में काम किया है। अपने अनोखे डांसिंग स्टाइल की वजह से लोग उन्हें जंपिंग जैक बुलाते थे। जीतेंद्र ने करीब 121 हिट फिल्में दीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कभी बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला। कभी 8 साल में 60 फिल्मों में काम करने वाले जीतेंद्र तकरीबन 23 साल पहले एक्टिंग छोड़ चुके हैं। 2001 में उन्हें फिल्म ‘कुछ तो है’ में देखा गया था। इसके बाद वो कुछ टीवी सीरियलों और वेब सीरीज में चंद मिनट के लिए ही नजर आए हैं। एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने तो ये तक कहा था कि उन्हें याद ही नहीं है कि वे कभी एक्टर थे। वैसे, एक्टिंग के अलावा जीतेंद्र ने प्रोडक्शन हाउस से भी मोटी कमाई की, लेकिन फिल्में प्रोड्यूस करते हुए जीतेंद्र दो बार दिवालिया भी हो गए थे। जीतेंद्र ने तब भी हार नहीं मानी और आज उनकी संपत्ति 1512 करोड़ रुपए है। जन्मदिन के मौके पर जानते हैं जीतेंद्र की लाइफ के कुछ दिलचस्प किस्से… राजेश खन्ना थे जीतेंद्र के क्लासमेट जीतेंद्र का जन्म 7 अप्रैल 1942 को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था। उनका असली नाम रवि कपूर है। जीतेंद्र के पिता अमरनाथ फिल्म इंडस्ट्री में नकली ज्वेलरी सप्लाई करने का काम करते थे, इसलिए पूरी फैमिली अमृतसर से मुंबई आकर बस गई थी। जीतेंद्र की शुरुआती पढ़ाई सेंट सेबेस्टियन गोअन हाई स्कूल, मुंबई में हुई थी। इसी स्कूल में उनके साथ राजेश खन्ना भी पढ़ते थे और दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। जीतेंद्र ने आगे की पढ़ाई मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज से पूरी की। ज्वेलरी सप्लाई करते-करते बने बॉडी डबल जीतेंद्र जब बड़े हुए तो अपने पिता के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। इसी सिलसिले में एक दिन वे फिल्ममेकर वी शांताराम से मिले। फिर अक्सर ज्वेलरी सप्लाई के सिलसिले में जीतेंद्र का शांताराम की फिल्म कंपनी में आना-जाना लगा रहता था। इसी दौरान उनके मन में हीरो बनने की इच्छा जाग गई। उन्होंने वी शांताराम से किसी फिल्म की शूटिंग देखने की इच्छा जताई। शांताराम ने कहा-सिर्फ शूटिंग देखने से काम नहीं चलेगा। काम करोगे? जीतेंद्र ने तुरंत हामी भर दी। फिल्म 'नवरंग' की शूटिंग के दौरान जीतेंद्र को छोटे-मोटे काम मिल जाया करते थे। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब जीतेंद्र की किस्मत चमक गई। ये किस्सा उन्होंने खुद 'द कपिल शर्मा शो' के दौरान सुनाया था। जब कपिल शर्मा ने उनसे पूछा था कि क्या आप स्ट्रगल के दिनों में हीरोइन के बॉडी डबल बने थे? इस पर जीतेंद्र ने कहा था, हां, मैं फिल्म 'सेहरा' की शूटिंग के दौरान जूनियर आर्टिस्ट था। मुझे शांताराम जी की चमचागिरी करनी पड़ती थी, मैं उस वक्त कुछ भी करने को तैयार था। तो एक दिन बीकानेर में शूटिंग के वक्त हीरोइन संध्या जी की कोई बॉडी डबल नहीं मिल रही थी। शांताराम जी ने मुझे संध्या जी का बॉडी डबल बना दिया और इस तरह मेरी फिल्मों में एंट्री हुई। पहली फिल्म की फीस थी 100 रु. शुरुआत में जीतेंद्र को काम तो मिला लेकिन छह महीने तक कोई फीस नहीं मिली। उनसे वी. शांताराम ने वादा किया था कि जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर उन्हें हर महीने 105 रु. दिए जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब वी.शांताराम ने जीतेंद्र को 1964 में फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' से ब्रेक दिया और तब अपनी पहली फिल्म की फीस के तौर पर जीतेंद्र को 100 रु. मिले। 'गीत गाया पत्थरों ने' से जीतेंद्र को ब्रेक तो मिला, लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। ऐसे में जीतेंद्र को फिर छोटे-मोटे रोल करके गुजारा करना पड़ा। हालांकि, उनके मन में अब भी सोलो लीडिंग स्टार बनने की तमन्ना थी। 1967 में रिलीज हुई ‘फर्ज’ जीतेंद्र के करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई, लेकिन बतौर लीड स्टार फिल्म इंडस्ट्री में जमना उनके लिए आसान नहीं था। सोलो लीड हीरो बनाने से पहले डायरेक्टर ने रखी जीतेंद्र के सामने शर्त एक बार फिल्ममेकर सुबोध मुखर्जी ने जीतेंद्र से कहा कि वो उन्हें लेकर एक सोलो हीरो फिल्म बनाना चाहते हैं। जीतेंद्र खुश हो गए, लेकिन तभी सुबोध ने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा- मैं फिल्म तभी बनाऊंगा, जब हेमा मालिनी इस फिल्म में काम करेंगी। दरअसल, उस दौर में हेमा मालिनी का स्टारडम किसी मेल सुपरस्टार से कम नहीं था। हेमा जिस फिल्म में होती थीं, उसके सफल होने की गारंटी 100% रहती थी। जीतेंद्र भी ये बात भांप गए कि अगर हेमा उनकी हीरोइन बन जाएं तो उनकी भी नैया पार लग जाएगी और वो भी बतौर हीरो स्थापित हो जाएंगे। मगर ये इतना आसान नहीं था। उस समय हेमा के करियर के फैसले उनकी मां जया चक्रवर्ती लेती थीं। जब जीतेंद्र ने उन्हें फिल्म के बारे में बताया तो उन्होंने मना कर दिया। जीतेंद्र उनके पीछे पड़ गए और कहा-आपकी बेटी अगर मेरे साथ फिल्म कर लेगी तो मेरा करियर बन जाएगा। आखिरकार जया मान गईं। जीतेंद्र ने ये बात सुबोध मुखर्जी को बताई और उन्होंने झट से हेमा को फिल्म में साइन कर लिया। हेमा को साइन करके डायरेक्टर ने जीतेंद्र को किया फिल्म से बाहर आगे मामले में ट्विस्ट तब आया जब सुबोध मुखर्जी ने फिल्म में जीतेंद्र के बजाए शशि कपूर को हीरो के तौर पर साइन कर लिया। ये बात जानकर जीतेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई, जब उन्होंने सुबोध से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, 'फिल्म के प्रोड्यूसर और फाइनेंसर ने कहा है कि जब हीरोइन हेमा मालिनी है तो हीरो भी बड़ा कास्ट करो, जीतेंद्र को लेने की क्या जरूरत। इसलिए मैंने शशि कपूर के साथ फिल्म अनाउंस कर दी।' जीतेंद्र ने जब सुबोध से कहा कि हेमा मेरी वजह से फिल्म में आई हैं तो उन्होंने दो टूक कह दिया कि हम यहां बिजनेस करने बैठे हैं। जीतेंद्र इस बात से मायूस हो गए लेकिन इसी दौरान एल.वी प्रसाद ने उन्हें फिल्म 'जीने की राह' का ऑफर दिया। ये फिल्म सुपरहिट हो गई और जीतेंद्र चमक गए जबकि हेमा और शशि कपूर स्टारर फिल्म 'अभिनेत्री' बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई। हेमा की मां जीतेंद्र से करवाना चाहती थीं बेटी की शादी जब जीतेंद्र बड़े स्टार बन गए तो हेमा की मां जया चक्रवर्ती को वे अपनी बेटी के लिए परफेक्ट लगे। जया, हेमा की उनसे शादी करवाना चाहती थीं। दरअसल, तब हेमा का अफेयर धर्मेंद्र से चल रहा था और संजीव कुमार भी हेमा से शादी का प्रस्ताव उनके घरवालों के सामने रख चुके थे। हेमा की मां को न संजीव कुमार पसंद थे और न ही धर्मेंद्र। वे नहीं चाहती थीं कि हेमा की इन दोनों में से किसी स्टार से शादी हो जबकि जीतेंद्र उन्हें बेटी के लिए पसंद थे। जया चक्रवर्ती ने बेटी हेमा की शादी जीतेंद्र से फिक्स कर दी थी और चेन्नई में दोनों सात फेरे भी लेने वाले थे। तभी धर्मेंद्र शादी के मंडप में जीतेंद्र की गर्लफ्रेंड शोभा को लेकर पहुंच गए और हेमा से उनकी शादी तुड़वा दी थी। इसके कुछ साल बाद जीतेंद्र ने 1974 में गर्लफ्रेंड शोभा से लव मैरिज कर ली थी। श्रीदेवी के साथ हर फिल्म में काम करना चाहते थे जीतेंद्र 1983 में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ पहली बार काम किया था। दोनों की जोड़ी को काफी पसंद किया गया। यही वजह है कि एक दौर ऐसा आया जब जीतेंद्र हर फिल्म में केवल श्रीदेवी के साथ ही काम करना चाहते थे। शक्ति कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'जीतेंद्र को 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी का काम इतना पसंद आया था कि उन्होंने डायरेक्टर राघवेंद्र से कहा कि वे अपनी सभी फिल्मों में उनके अपोजिट केवल श्रीदेवी को बतौर हीरोइन साइन करें।' यही वजह थी कि 'हिम्मतवाला' के बाद राघवेंद्र राव ने जब 'जानी दोस्त' (1983), 'जस्टिस चौधरी' (1983), 'तोहफा' (1984), 'सुहागन' (1986), 'धर्माधिकारी' (1986) और 'दिल लगाके देखो' (1988) फिल्में बनाईं तो उन्होंने इनमें श्रीदेवी को ही लिया। जीतेंद्र को रेखा ने दी थी श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ काम करने के बारे में बात की थी। उन्होंने कहा था, 'श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह मुझे रेखा ने दी थी। एक दिन मैं और रेखा, श्रीदेवी की कोई तेलुगु फिल्म देख रहे थे। रेखा ने मुझसे कहा, 'तुम्हें श्रीदेवी के साथ जरूर काम करना चाहिए। उस वक्त रेखा के पास 'हिम्मतवाला' के लिए डेट्स नहीं थी। वे फिल्म में काम करने से मना कर चुकी थीं। ऐसे में मैंने राघवेंद्र राव को श्रीदेवी को कास्ट करने का सुझाव दिया और वे मान गए। इस तरह 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी की एंट्री हुई। श्रीदेवी का डांस में कोई मुकाबला नहीं था। जब 'हिम्मतवाला' की शूटिंग के दौरान डांस मास्टर हमें स्टेप्स सिखाते थे तो श्रीदेवी केवल दो रिहर्सल में ही स्टेप्स सीख जाती थीं और मैं कई बार प्रैक्टिस करता था लेकिन वे भी मेरे साथ तब तक रिहर्सल करती थीं, जब तक मैं अपना डांस स्टेप परफेक्ट तरीके से न कर लूं।' 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया 1975 के आसपास जब जीतेंद्र को बतौर हीरो फिल्में मिलना बंद हो गईं तो उनकी फाइनेंशियल कंडीशन काफी खराब हो गई थी। इसके बाद जीतेंद्र दूसरी बार तब दिवालिया हुए जब उन्होंने फिल्म प्रोड्यूस करने के बारे में सोचा। 1982 में उन्होंने फिल्म 'दीदार-ए-यार' बनाई जो कि फ्लॉप साबित हुई। इससे जीतेंद्र को काफी नुकसान हुआ। खराब आर्थिक स्थिति से उबरने के लिए जीतेंद्र ने 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया। जीतेंद्र के इतनी फिल्में करने पर लोग उन्हें इनसिक्योर एक्टर तक कहने लगे थे, लेकिन जीतेंद्र को इसमें कुछ गलत नहीं लगता। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैंने 8 साल में लगातार 60 फिल्में इसलिए कीं, क्योंकि ये सच है कि 1980 के दौर में मैं काफी इनसिक्योर था। मैं गोरेगांव की चॉल से उठा व्यक्ति हूं। मैंने वो समय देखा है, जब मेरे घर में पंखा लगा था तो पूरी चॉल के लोग उसे देखने के लिए आए थे। मैंने बुरा दौर करीब से देखा है, इसलिए मैं पागलों की तरह काम करता था।' मैं जॉबलैस हूं' जीतेंद्र 23 साल से फिल्मों से दूर हैं, लेकिन इसके बावजूद वे 1512 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपने प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स, ऑल्ट बालाजी और बालाजी मोशन पिक्चर के जरिए उनकी सालाना कमाई 300 करोड़ रु. तक है। जीतेंद्र ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था, '20 से ज्यादा साल हो गए, मैं जॉबलैस एक्टर हूं। मैंने अपना एक रुपया नहीं कमाया है। शोभा (पत्नी) और एकता (बेटी) सब काम संभालती हैं। मेरा योगदान केवल इतना है कि मैंने उस पैसे को सही जगह इन्वेस्ट किया है जो कि उन्होंने कमाया है और वो सारे इन्वेस्टमेंट मेरे लिए फायदेमंद साबित हुए हैं।' शराब-सिगरेट को 22 साल से हाथ नहीं लगाया जीतेंद्र ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे पहले खूब सिगरेट और शराब पीते थे, लेकिन 22 साल पहले ये सब छोड़ चुके हैं। जीतेंद्र ने कहा था-जवानी के दिनों में मैंने अपनी हेल्थ के साथ जितने खिलवाड़ करने थे, सब कर चुका। लेकिन जब मैं 60 साल का हुआ तो मैंने ये सब छोड़ दिया। लोग मुझे इस उम्र में भी फिट होने पर कॉम्प्लीमेंट देते हैं तो मैं उन्हें भी ये सब छोड़ने की सलाह देता हूं। आज के दौर में मुझे सलमान खान और ऋतिक रोशन की फिटनेस बहुत अच्छी लगती है।
9 फिल्‍में और दांव पर 600 करोड़, अक्षय-अजय देवगन के लिए ईद पर सलमान का रिकॉर्ड तोड़ पाना लगभग नामुमकिन!
‘बिग बॉस देख रहे हैं’: गृह मंत्रालय के चप्पे-चप्पे पर अब तीसरी आंख से नजर
66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का ऐलान, अंधाधुन बेस्ट हिंदी फिल्म, आयुष्मान और विकी कौशल बेस्ट ऐक्टर
विवादित वीडियो मामला: मुश्किल में एजाज खान, कोर्ट ने 1 दिन की पुलिस कस्टडी में भेजा

राजस्थान


जयपुर: पिछले दिनों जब राज्य सरकार ने अंग्रेजी मीडियम की सरकारी स्कूलों पर समीक्षा करने के लिए मंत्रिमंडलीय कमेटी का गठन किया तो स्कूलों को बंद किए जाने के सवाल उठने लगे। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के शासन में सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूलों का संचालन शुरु किया गया था। पूर्ववर्ती सरकार के इस फैसले पर समीक्षा के लिए कमेटी बनाई गई तो कांग्रेसी नेताओं ने विरोध शुरू कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कई नेताओं ने कहा कि भजनलाल सरकार बच्चों के भविष्य को बर्बाद करना चाहती है। स्कूलें बंद करने का विचार करना ही बच्चों के भविष्य के खिलाफ है। गहलोत के इस बयान के बाद सरकार के मंत्री जोगाराम पटेल ने पलटवार किया है। पटेल ने कहा कि सभी स्कूलों को बंद नहीं कर रहे हैं। समीक्षा से वस्तु स्थिति आएगी सामने कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि सरकार इंग्लिश मीडियम की सभी स्कूलों को बंद नहीं करने जा रही है लेकिन इस पर समीक्षा करना जरूरी है। समीक्षा से सरकारी अंग्रेजी मीडियम की स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी। पटेल ने कहा कि अधिकतर स्कूलों में केवल इंग्लिश मीडियम के बोर्ड लगाए गए हैं। योग्य टीचर और पाठ्य सामग्री को लेकर कई तरह की शिकायतें सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि जिन स्कूलों की स्थिति सही है, उन्हें बरकरार रखा जाएगा। कई स्कूलें ऐसी भी हैं जहां पर दक्ष शिक्षकों की व्यवस्था नहीं है। वहां अंग्रेजी मीडियम की पढ़ाई सही तरीके से नहीं हो रही है। ऐसी स्कूलों पर केवल अंग्रेजी मीडियम का बोर्ड लगाना उचित नहीं है। केवल राजनैतिक लाभ के लिए लगा दिए बोर्ड पटेल ने कहा कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने कई फैसले राजनैतिक लाभ के लिए लिये थे। यह किसी से छिपा नहीं है। इंग्लिश मीडियम स्कूलें भी बिना किसी तैयारी के खोल दी गई। कांग्रेस ने इस बात का बिल्कुल ध्यान रखा कि अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में पढाई का स्तर और गुणवत्ता भी सुधारनी है। कई स्कूलें ऐसी भी हैं जहां स्टूडेंट्स का एडमिशन भी नहीं हो रहा है। वहां अभिभावक खुद चाहते हैं कि उन्हें हिंदी मीडियम स्कूल चाहिए। इन्हीं को देखते हुए सरकार ने समीक्षा के लिए कमेटी बनाई है।
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मदन अरोड़ा.बिहार ने एक बार फिर भारतीय राजनीति को स्पष्ट संदेश दिया है. मतदाता अब किसी भी नकारात्मक प्रचार, जातीय जहर या हवाई वादों से प्रभावित होने वाला नहीं है. इस चुनाव में न केवल गठबंधन ध्वस्त हुआ, बल्कि वह पूरा आख्यान भी धराशायी हो गया जो महीनों तक ‘वोट चोरी’, ‘नरेंद्र सरेंडर’ और ‘हर परिवार को नौकरी’ के नारों पर टिका था. राहुल–तेजस्वी का नकारात्मक कैंपेन और बंटाधार की राजनीति कहावत है—जहां-जहां पाँव पड़े संतन के, तहां तहां बंटाधार. बिहार में यह कहावत राजनीतिक रूप से इस बार राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर सटीक बैठती दिखी. राहुल गांधी का पीएम मोदी के खिलाफ ‘वोट चोरी’ अभियान और ‘चोरी का पीएम’ जैसी भाषा न केवल मतदाताओं को अखरी, बल्कि इससे गठबंधन की विश्वसनीयता भी तार-तार हो गई. दूसरी ओर तेजस्वी यादव जो ताजपोशी के सपने देख रहे थे—राहुल गांधी के कटु और नकारात्मक प्रचार की वजह से खुद भी डूब गए. प्रधानमंत्री मोदी जिस “ऐतिहासिक प्रचण्ड जीत” का दावा कर रहे थे, बिहार के मतदाताओं ने उस पर भरोसा दिखाते हुए एनडीए को 2010 की तरह एक बार फिर प्रचण्ड बहुमत दे दिया. नीतीश–मोदी की जोड़ी राहुल–तेजस्वी पर भारी पड़ी. तेजस्वी के वादे हुए फेल तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों से लेकर हर परिवार को नौकरी, जनवरी से 30 हजार रुपये और दीदियों के लिए पैकेज जैसे बड़े वादे किए. लेकिन मतदाता समझ गया कि ये वादे ज़मीन से ज्यादा हवा में बने थे. इसके उलट नीतीश–मोदी सरकार द्वारा पहले से चल रहे महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों पर महिलाओं ने भरोसा दिखाया. * लगभग डेढ़ करोड़ ‘दीदियों’ ने तेजस्वी के वादों से प्रभावित होने के बजाय उस स्थिर नीति को प्राथमिकता दी जो उन्हें वर्षों में मिली थी. * महिला–युवा के नए एमवाई गठबंधन का जादू चला, और पारंपरिक मुस्लिम–यादव (एमवाई) समीकरण बिखर गया. एमवाई समीकरण की मौत: मुस्लिम–यादव वोट क्यों खिसके? महागठबंधन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल रही—मुस्लिम डिप्टी सीएम की घोषणा न करना. ओवैसी ने इसे भुनाते हुए खुलकर कहा कि गठबंधन “मुसलमानों को सिर्फ दरी बिछाने वाला” समझता है. यह बयान मुस्लिम वोटों के लिए निर्णायक साबित हुआ. इसी तरह यादवों के भीतर यह नाराज़गी गहराती गई कि सीएम और पार्टी अध्यक्ष पद पर लालू परिवार का एकाधिकार जारी है और यादव समाज केवल परिवारवादी राजनीति का उपकरण बनकर रह गया है. इस असंतोष का फायदा एनडीए को मिला. नक्सलवाद, सुरक्षा और एस आई आर का प्रभाव बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों में पिछले वर्षों में नक्सलवाद लगभग समाप्त हुआ है. नक्सली भय खत्म होने से वामपंथी दलों का प्रभाव टूटा और सुरक्षा को लेकर भाजपा के प्रति भरोसा मजबूत हुआ. उधर एस आई आर(वोटर सूची शुद्धिकरण) का अप्रत्यक्ष प्रभाव भी दिखा— घुसपैठियों के वोट कटने से गठबंधन के कोर वोट बैंक पर चोट पहुंची.इससे मुस्लिम बहुल इलाकों में एनडीए की पैठ मजबूत हुई. साथ ही दिल्ली में मतदान से एक दिन पहले हुए विस्फोट ने हिंदू मतदाताओं में सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा की, जिसका सीधा लाभ एनडीए को मिला. मोदी–योगी–शाह की तिकड़ी ने बदला खेल मोदी का राष्ट्रवाद, योगी की सनातनी हुंकार, और अमित शाह की जंगलराज की वापसी न होने देने की चेतावनी ने जमीन पर गहरी पकड़ बनाई. इनकी रैलियों में उमड़ा अभूतपूर्व जनसैलाब पहले ही संकेत दे चुका था कि हवा किस दिशा में बह रही है. गठबंधन की हार का सार महागठबंधन की करारी हार कई बातों का मिला-जुला परिणाम है— 1. वोट चोरी का नकारात्मक अभियान उल्टा पड़ा. 2. मुस्लिम डिप्टी सीएम घोषित न करने की भारी गलती हुई. 3. यादव वोटों का लालू परिवार के खिलाफ फिसलना. 4. ओवैसी द्वारा मुस्लिम मतदाताओं का खिंचाव. 5. एस आई आर से घुसपैठियों के वोट कटना. 6. नक्सलवाद पर सरकार की सफलता. 7. फर्जी वादे बनाम वास्तविक विकास. 8. मोदी–योगी–शाह की आक्रामक और प्रभावी चुनावी रणनीति. बिहार का संदेश: राष्ट्रवाद और विकास ही निर्णायक मुद्दे इस चुनाव ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि— * राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति में सर्वोच्च मुद्दा है. * सनातन पर चोट या तुष्टिकरण अब स्वीकार नहीं. * मतदाता जातियों में बंटने के प्रयास को अस्वीकार करता है. * घुसपैठिया संरक्षण की राजनीति नहीं चलेगी. * मतदाता जानता है कि किसने जमीन पर काम किया और किसने हवा में सपने बेचे. बिहार का जनादेश यह भी बताता है कि वोट बैंक की राजनीति का आख्यान टूट रहा है. मुसलमानों और यादवों दोनों ने दिखा दिया कि वे किसी भी परिवार या दल के बंधक नहीं हैं. विपक्ष अब क्या करेगा? हार के तुरंत बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया है. “बिहार में वोट चोरी नहीं—डकैती हुई है” जैसे बयान सामने आ रहे हैं. संभावना है कि विपक्ष— * हरियाणा के CM के पुराने बयान * पीएम मोदी का ‘ऐतिहासिक जीत’ वाला वक्तव्य * अमित शाह के 160 सीटों से ज्यादा सीटों के अनुमान को मिलाकर एक नया ‘वोट चोरी’ नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश करे. लेकिन इसमें सबसे बड़ा खतरा है—जनादेश का अपमान होगा.खासतौर पर जेन-ज़ी को उकसाकर सड़कों पर उतारने की कोशिश राजनीतिक स्थिति को अस्थिर कर सकती है. बिहार का यह परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भारतीय मतदाता की परिपक्वता और राजनीतिक जागरूकता का प्रमाण है. मतदाता अब स्पष्ट रूप से बता चुका है कि— * वह राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखता है. * बिना आधार वाले आरोपों को नहीं मानता. * हवा हवाई वादों के बजाय परिणाम देखता है. * और, सबसे बढ़कर, वह अब किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार से बरगलाने वाला नहीं है. राहुल–तेजस्वी महा गठबंधन का बिखरना इस बात का संकेत है कि परिवारवादी राजनीति, तुष्टिकरण और नकारात्मक प्रचार की राजनीति की उम्र अब समाप्ति पर है. विकास, सुरक्षा और स्थिरता की राजनीति ही भविष्य का रास्ता है और बिहार ने इस राह को एक बार फिर रोशनी दे दी है.यह चुनाव परिणाम अखिलेश यादव और ममता बनर्जी के लिए भी खतरे की घंटी है.
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वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। हालांकि, भारत ने आधिकारिक रूप से इस दावे पर कोई टिप्पणी नहीं की है। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने समझौते की पुष्टि की है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दोनों देशों से बात की थी इसके बाद से माना जा रहा था कि दोनों देशों में शायद तनाव कम हो। ट्रंप ने क्या बताया? ट्रंप ने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा, " संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता में एक लंबी रात तक चली बातचीत के बाद, मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। दोनों देशों को सामान्य बुद्धि और महान बुद्धिमत्ता का उपयोग करने के लिए बधाई। इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद।" अमेरिकी विदेश मंत्री ने बताया कैसे हुई डील पिछले 48 घंटों में, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और मैंने वरिष्ठ भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ बातचीत की है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ, विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर, सेनाध्यक्ष असीम मुनीर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और असीम मलिक शामिल हैं। मुझे यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गई हैं तथा तटस्थ स्थल पर व्यापक मुद्दों पर वार्ता शुरू करने पर सहमत हो गई हैं। हम शांति का मार्ग चुनने में प्रधानमंत्री मोदी और शरीफ की बुद्धिमत्ता, विवेक और कूटनीति की सराहना करते हैं।
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