हनुमानगढ़


चार खेमों में बंटता चुनाव, भाजपा-कांग्रेस की सूची से पहले ही गर्म हुआ माहौल; परिवारवाद, बाहरी उम्मीदवार, दलबदल और धनबल के बीच जेन ज़ी के सामने पांच साल की जवाबदेही का है सवाल. मदन अरोड़ा.स्थानीय निकाय चुनाव इस बार केवल पार्षद चुनने का चुनाव नहीं रह गया है. यह पुरानी सियासी कार्यशैली और नई पीढ़ी की बदलती राजनीतिक सोच के बीच मुकाबला बनता दिखाई दे रहा है. शहर में चुनावी सरगर्मी बढ़ रही है और उसके साथ राजनीतिक बेचैनी भी. यह बेचैनी चुनाव जीतने की इच्छा से ज्यादा हार की आशंका से जुड़ी दिखाई देती है. कुछ पुराने चेहरे अपना वार्ड छोड़कर दूसरे वार्डों में पहुंच गए हैं. जहां पांच साल तक राजनीति की, वहां अब परिस्थितियां अनुकूल नहीं दिखीं तो नए वार्ड में राजनीतिक भविष्य तलाशने की कोशिश हो रही है. चेहरे पुराने हैं, वादे पुराने हैं, लेकिन इस बार सियासी परिवारों की अगली पीढ़ी के चेहरे भी मैदान में उतर आए हैं. पत्नी, बेटी और रिश्तेदारों की राजनीतिक भागीदारी ने परिवारवाद की बहस को भी हवा दे दी है. और इसी चुनाव में एक नया फैक्टर उभर रहा है-जेन ज़ी. . चार खेमों में बंटता चुनाव फिलहाल चुनावी तस्वीर चार प्रमुख धाराओं में दिखाई दे रही है. पहला खेमा भाजपा का.दूसरा कांग्रेस का. तीसरा निर्दलीय विधायक गणेश राज बंसल का राजनीतिक खेमा. चौथा खेमा माकपा, आम आदमी पार्टी और टिकट न मिलने या अपने राजनीतिक हितों के कारण निर्दलीय मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों का. निर्दलीय विधायक की ओर से करीब - करीब  उम्मीदवारों के नाम सामने आ चुके हैं. इनमें विधायक की पत्नी संतोष बंसल वार्ड 17 से, बेटी सोनू गणेश राज वार्ड 11 से, पूर्व सभापति सुमित रिणवा वार्ड 7 से और उनकी पत्नी मंजू रिणवा वार्ड 13 से चुनाव मैदान में हैं. भाजपा और कांग्रेस की अधिकृत सूची अभी सामने नहीं आई है. इनके एक दो रोज में आना संभावित है.इसलिए वास्तविक मुकाबले की तस्वीर दोनों दलों की सूची आने के बाद ही पूरी तरह साफ होगी. लेकिन इतना तय है कि चुनाव बहुकोणीय होने जा रहा है और कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार मुकाबले का गणित बदल सकते हैं. .भाजपा-कांग्रेस की सूची आएगी और बदलेगा विधायक खेमे का गणित? राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा और कांग्रेस की अधिकृत सूची जारी होने के बाद निर्दलीय विधायक के खेमे की चुनावी रणनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. कई ऐसे उम्मीदवार, जिन्हें फिलहाल विधायक खेमे की ओर से आगे बढ़ाया गया है, उनकी स्थिति भाजपा और कांग्रेस की सूची आने के बाद बदल सकती है. कुछ उम्मीदवारों को हटाया जा सकता है और उनकी जगह कुछ नए चेहरे मैदान में उतारे जा सकते हैं. और राजनीतिक चर्चा तो यहां तक है कि कुछ पूर्व पार्षदों की उम्मीदवारी पर भी गाज गिर सकती है. इसका कारण केवल चुनावी जीत-हार का गणित नहीं, बल्कि यह भी बताया जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवार सामने आने के बाद प्रत्येक वार्ड में मुकाबले की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा. यदि किसी वार्ड में विधायक खेमे का घोषित उम्मीदवार कमजोर दिखाई देता है तो वहां नया चेहरा उतारने की कोशिश हो सकती है. इसी तरह किसी मजबूत दावेदार को किसी दूसरे वार्ड में भेजने या निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने की रणनीति भी अपनाई जा सकती है. हालांकि ये अभी राजनीतिक चर्चाएं हैं. अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों की अधिकृत सूची और नामांकन के बाद ही स्पष्ट होगी. लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा और कांग्रेस की सूची आने के बाद विधायक खेमे के भीतर टिकट और उम्मीदवारों को लेकर हलचल बढ़ सकती है. . दलबदलुओं को टिकट या निष्ठावान कार्यकर्ताओं को अवसर? भाजपा के भीतर दलबदल करने वाले कुछ पूर्व पार्षदों को फिर टिकट दिए जाने की संभावित कोशिशों ने पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं के बीच सवाल खड़े किए हैं. सवाल है -जो व्यक्ति निजी राजनीतिक हित में पार्टी छोड़ सकता है, उसके जीतने के बाद पार्टी के साथ खड़े रहने की गारंटी क्या है? यदि केवल चुनाव जीतने की संभावना के आधार पर दलबदलू को टिकट दिया जाता है तो वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता के मन में स्वाभाविक सवाल उठेगा, फिर निष्ठा की कीमत क्या है? प्रदेश भाजपा नेतृत्व के हालिया निर्णयों से ऐसे कार्यकर्ताओं को उम्मीद जरूर बंधी है कि टिकट वितरण में स्थानीयता, निष्ठा, संगठन के प्रति समर्पण और युवा चेहरों को प्राथमिकता मिल सकती है.लेकिन असली परीक्षा अब टिकट वितरण के समय होगी. . रणनीति चाहे जितनी हो, अंतिम फैसला वोटर करेगा राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा और कांग्रेस की महिला उम्मीदवारों को कमजोर करने के लिए कुछ वार्डों में विधायक खेमे की ओर से अधिक निर्दलीय उम्मीदवार उतारे जा सकते हैं. वार्ड 30, 23, 42 और 18 जैसे वार्डों को लेकर चर्चाएं इसी संदर्भ में हैं. लेकिन चुनावी रणनीति बनाने वाले भूल जाते हैं कि मतदाता भी रणनीति समझता है. यदि एक वार्ड में अचानक बहुत सारे उम्मीदवार खड़े होते हैं तो मतदाता यह सवाल भी पूछ सकता है- इतने उम्मीदवार अचानक क्यों? किसका वोट काटने के लिए? किसे फायदा पहुंचाने के लिए? और किसे रोकने के लिए? राजनीति में गणित बहुत कुछ तय करता है, लेकिन अंततः वोटर का विवेक किसी भी गणित को उलट सकता है. .  जेन ज़ी पूछ रही है,चेहरा नया चाहिए या सिर्फ नारा नया? शहर के लगभग 1.32 लाख मतदाताओं में करीब 26 हजार जेन ज़ी मतदाताओं की मौजूदगी चुनाव के परिणामों पर असर डाल सकती है. यह पीढ़ी केवल यह नहीं पूछेगी कि उम्मीदवार किस पार्टी से है. वह पूछेगी-पांच साल में किया क्या? वार्ड में कितनी बार दिखाई दिए? समस्या लेकर गए तो समाधान हुआ या केवल आश्वासन मिला? विकास के नाम पर कितना पैसा खर्च हुआ? और उसका हिसाब कहां है? यही सवाल इस चुनाव को पुराने चुनावों से अलग कर सकते हैं. . बाहरी उम्मीदवार बनाम वार्ड का अपना चेहरा इस चुनाव में 'बाहरी उम्मीदवार' का मुद्दा भी तेजी से उभर रहा है. जिसने पांच साल एक वार्ड में राजनीति की और चुनाव आते ही दूसरे वार्ड में पहुंच गया, उससे नया वार्ड  के मतदाता और स्थानीय उम्मीदवार सवाल खड़े कर रहे हैं - पुराना वार्ड क्यों छोड़ा? यदि आपने पांच साल अपने पुराने वार्ड में काम किया था तो वहां से चुनाव लड़ने में परेशानी क्या थी? और यदि वहां की जनता का भरोसा आपके साथ नहीं रहा तो नए वार्ड की जनता आप पर भरोसा क्यों करे? आरक्षण या परिसीमन के कारण वार्ड बदलना अलग बात है, लेकिन राजनीतिक सुविधा के लिए वार्ड बदलना मतदाता के सवालों से बच नहीं सकता. जेन ज़ी के लिए उम्मीदवार का सबसे महत्वपूर्ण परिचय यही होगा कि वह चुनाव के पहले नहीं, चुनाव के बाद भी वार्ड में उपलब्ध रहता है या नहीं. . परिवारवाद का सवाल भी लौटकर आया सामने विधायक गणेश राज बंसल की पत्नी संतोष बंसल और बेटी सोनू गणेश राज के चुनाव मैदान में उतरने के बाद परिवारवाद पर चर्चा स्वाभाविक है.राजनीति में परिवार के किसी सदस्य को चुनाव लड़ाना किसी व्यक्ति का राजनीतिक अधिकार हो सकता है, लेकिन मतदाता को यह पूछने का अधिकार भी है  कि  क्या पार्टी और संगठन में काम करने वाले दूसरे कार्यकर्ताओं को अवसर नहीं मिलना चाहिए? विधानसभा चुनाव में परिवारवाद को लेकर जिन नेताओं पर सवाल उठाए गए थे, वही सवाल अब राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के साथ वापस सामने हैं. सियासत में आरोप कभी स्थायी नहीं रहते. समय घूमता है और सवाल पूछने वाला कभी-कभी खुद सवालों के घेरे में आ जाता है. . जेन ज़ी पूछेगी, विकास हुआ या विकास के नाम पर किसी का विकास? हर उम्मीदवार विकास का दावा करेगा. लेकिन इस बार विकास शब्द को केवल भाषण से स्वीकार करने के बजाय उसका हिसाब मांगने की जरूरत है. काम कितना हुआ? कितने में हुआ? काम की गुणवत्ता कैसी रही? किस वार्ड को कितना मिला? और जनता को खर्च का पूरा हिसाब क्यों नहीं दिया गया? पिछले बोर्ड में हुए काम और खर्च का सार्वजनिक हिसाब मांगना मतदाता का अधिकार है. पूर्व सभापति हों या पूर्व पार्षद, जिसने पांच साल जनता का प्रतिनिधित्व किया है, उससे पांच साल का हिसाब मांगना लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया और अधिकार भी है. . बोर्ड किसका नहीं, बोर्ड कैसा? राजनीतिक चर्चाओं में विधायक खेमे के 15-16 पार्षद जीतने और 31 के लक्ष्य की बातें हो रही हैं. कुछ राजनीतिक चर्चाओं में बहुमत पूरा करने के लिए चुनाव के बाद निर्दलीय पार्षदों को साथ लाने की संभावनाओं का भी उल्लेख हो रहा है. लेकिन मतदाता को इस गणित से ऊपर उठना होगा. बोर्ड किसका बनेगा? से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है, बोर्ड कैसा बनेगा? क्या बोर्ड जनता के प्रति जवाबदेह होगा? क्या पार्षद पांच साल वार्ड में उपलब्ध रहेगा? क्या नगर परिषद के खर्च का हिसाब सार्वजनिक होगा? क्या विकास कार्यों में पारदर्शिता होगी? यदि इन सवालों का जवाब हां है तो बोर्ड किसी का भी हो, शहर का होगा. . धनबल के मुकाबले मतदाता की ताकत चुनावी चर्चाओं में इस बार भी बड़े पैमाने पर धनबल के इस्तेमाल की संभावनाएं जताई जा रही हैं. यदि कोई उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए भारी पैसा खर्च करता है तो मतदाता को यह सवाल जरूर पूछना चाहिए - इस पैसे की भरपाई कहां से होगी? वोट बेचने वाला केवल अपना एक वोट नहीं बेचता. वह अगले पांच साल की अपनी आवाज कमजोर करता है.आज का छोटा लाभ कल नगर परिषद के बड़े फैसलों पर असर डाल सकता है. यही वह संदेश है जिसे जेन ज़ी और आम मतदाता तक पहुंचाने की जरूरत है. . जेन ज़ी का मूड बदला तो पुराने समीकरण भी बदलेंगे नई पीढ़ी केवल भाषण नहीं सुनती. वह सवाल करती है, रिकॉर्ड देखती है, पुराने बयान खोजती है और नेताओं के राजनीतिक सफर की तुलना करती है. किसने कब किसका साथ दिया? किसने पार्टी कब छोड़ी? कौन चुनाव से पहले किसके साथ था और चुनाव के बाद किसके साथ गया? किसने पांच साल वार्ड में काम किया? और कौन केवल चुनाव के समय दिखाई दिया? इसलिए इस बार पोस्टर और प्रचार से ज्यादा महत्वपूर्ण विश्वसनीयता होगी. . भाजपा और कांग्रेस की भी अग्निपरीक्षा भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अवसर है कि वे समर्पित, ईमानदार, युवा और स्थानीय चेहरों को आगे लाएं. यदि दोनों दल एक स्पष्ट और पारदर्शी बोर्ड का भरोसा देते हैं, पांच साल की जवाबदेही स्वीकार करते हैं और उम्मीदवारों के चयन में निष्ठा तथा स्थानीयता को प्राथमिकता देते हैं तो वे मतदाता के सामने मजबूत विकल्प रख सकते हैं. लेकिन यदि पुराने समीकरण, सिफारिश, प्रभाव और अवसरवाद हावी हुए तो बदलाव की तलाश में निकला मतदाता तीसरा रास्ता भी चुन सकता है. . जेन ज़ी के सामने पांच साल का फैसला मतदाता को इस चुनाव में केवल यह नहीं देखना कि कौन जीत सकता है. यह भी देखना है कि जीतने के बाद कौन जनता के काम आएगा. अपने उम्मीदवार से पूछना होगा - आप वार्ड में कितने उपलब्ध रहेंगे? आपकी पहली पांच प्राथमिकताएं क्या होंगी? नगर परिषद के खर्च में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित करेंगे? आप जनता के प्रति जवाबदेह कैसे रहेंगे? और पांच साल बाद अपना पूरा हिसाब देने के लिए तैयार हैं या नहीं? जो उम्मीदवार इन सवालों का जवाब देने से बचता है, उससे सवाल और ज्यादा पूछने होंगें. . वोट आपका है, भविष्य भी आपका स्थानीय निकाय चुनाव का मतलब केवल एक पार्षद चुनना नहीं है. यह तय करना है कि अगले पांच वर्षों में आपके वार्ड की आवाज कौन बनेगा. इसलिए फैसला जाति, रिश्तेदारी, दबाव, धनबल या चमकदार प्रचार देखकर नहीं, उम्मीदवार की नीयत और पिछले रिकॉर्ड देखकर कीजिये. जो अपना वार्ड बदलकर आया है, उससे कारण पूछिए. जो पांच साल बाद दिखाई दिया है, उससे पांच साल की अनुपस्थिति का कारण पूछिए. जो पैसा खर्च कर रहा है, उससे पूछिए कि उस खर्च की कीमत जनता से कैसे वसूली जाएगी. जो परिवार के कई सदस्यों को राजनीति में उतार रहा है, उससे पूछिए कि संगठन के दूसरे कार्यकर्ताओं की बारी कब आएगी. और जो विकास की बात कर रहा है, उससे  भी पूछना होगा - विकास कितना हुआ और हिसाब कहां है? इस बार चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बोर्ड किसका बनेगा. सबसे बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए- बोर्ड जनता का होगा या नेताओं का? और यह जेन ज़ी ही कर सकता है. क्योंकि जेन ज़ी केवल नई पीढ़ी नहीं है, वह पुराने राजनीतिक तौर-तरीकों से जवाब मांगने वाली पीढ़ी भी बन सकती है. इसलिए वोट को चंद सिक्कों में मत बेचिए.सवाल पूछिए. हिसाब मांगिए.उम्मीदवार को परखिए.फिर वोट दीजिए. क्योंकि चुनाव एक दिन का होता है, लेकिन उसका असर पांच साल रहता है. इस बार चेहरा नहीं, चरित्र चुनिए.वादे नहीं, काम चुनिए. प्रचार नहीं, जवाबदेही चुनिए. और यदि  जेन ज़ी ने सचमुच अपना फैसला खुद लिख दिया तो संभव है कि इस बार केवल पार्षद न बदलें, शहर की सियासत का मिजाज भी बदल जाए.
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बॉलीवुड के बीते जमाने के स्टार जीतेंद्र आज 82 साल के हो गए। तकरीबन चार दशक लंबे करियर में जीतेंद्र ने 'तोहफा', 'हिम्मतवाला', 'कारवां', 'परिचय', 'मवाली' समेत कई हिट फिल्मों में काम किया है। अपने अनोखे डांसिंग स्टाइल की वजह से लोग उन्हें जंपिंग जैक बुलाते थे। जीतेंद्र ने करीब 121 हिट फिल्में दीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कभी बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला। कभी 8 साल में 60 फिल्मों में काम करने वाले जीतेंद्र तकरीबन 23 साल पहले एक्टिंग छोड़ चुके हैं। 2001 में उन्हें फिल्म ‘कुछ तो है’ में देखा गया था। इसके बाद वो कुछ टीवी सीरियलों और वेब सीरीज में चंद मिनट के लिए ही नजर आए हैं। एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने तो ये तक कहा था कि उन्हें याद ही नहीं है कि वे कभी एक्टर थे। वैसे, एक्टिंग के अलावा जीतेंद्र ने प्रोडक्शन हाउस से भी मोटी कमाई की, लेकिन फिल्में प्रोड्यूस करते हुए जीतेंद्र दो बार दिवालिया भी हो गए थे। जीतेंद्र ने तब भी हार नहीं मानी और आज उनकी संपत्ति 1512 करोड़ रुपए है। जन्मदिन के मौके पर जानते हैं जीतेंद्र की लाइफ के कुछ दिलचस्प किस्से… राजेश खन्ना थे जीतेंद्र के क्लासमेट जीतेंद्र का जन्म 7 अप्रैल 1942 को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था। उनका असली नाम रवि कपूर है। जीतेंद्र के पिता अमरनाथ फिल्म इंडस्ट्री में नकली ज्वेलरी सप्लाई करने का काम करते थे, इसलिए पूरी फैमिली अमृतसर से मुंबई आकर बस गई थी। जीतेंद्र की शुरुआती पढ़ाई सेंट सेबेस्टियन गोअन हाई स्कूल, मुंबई में हुई थी। इसी स्कूल में उनके साथ राजेश खन्ना भी पढ़ते थे और दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। जीतेंद्र ने आगे की पढ़ाई मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज से पूरी की। ज्वेलरी सप्लाई करते-करते बने बॉडी डबल जीतेंद्र जब बड़े हुए तो अपने पिता के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। इसी सिलसिले में एक दिन वे फिल्ममेकर वी शांताराम से मिले। फिर अक्सर ज्वेलरी सप्लाई के सिलसिले में जीतेंद्र का शांताराम की फिल्म कंपनी में आना-जाना लगा रहता था। इसी दौरान उनके मन में हीरो बनने की इच्छा जाग गई। उन्होंने वी शांताराम से किसी फिल्म की शूटिंग देखने की इच्छा जताई। शांताराम ने कहा-सिर्फ शूटिंग देखने से काम नहीं चलेगा। काम करोगे? जीतेंद्र ने तुरंत हामी भर दी। फिल्म 'नवरंग' की शूटिंग के दौरान जीतेंद्र को छोटे-मोटे काम मिल जाया करते थे। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब जीतेंद्र की किस्मत चमक गई। ये किस्सा उन्होंने खुद 'द कपिल शर्मा शो' के दौरान सुनाया था। जब कपिल शर्मा ने उनसे पूछा था कि क्या आप स्ट्रगल के दिनों में हीरोइन के बॉडी डबल बने थे? इस पर जीतेंद्र ने कहा था, हां, मैं फिल्म 'सेहरा' की शूटिंग के दौरान जूनियर आर्टिस्ट था। मुझे शांताराम जी की चमचागिरी करनी पड़ती थी, मैं उस वक्त कुछ भी करने को तैयार था। तो एक दिन बीकानेर में शूटिंग के वक्त हीरोइन संध्या जी की कोई बॉडी डबल नहीं मिल रही थी। शांताराम जी ने मुझे संध्या जी का बॉडी डबल बना दिया और इस तरह मेरी फिल्मों में एंट्री हुई। पहली फिल्म की फीस थी 100 रु. शुरुआत में जीतेंद्र को काम तो मिला लेकिन छह महीने तक कोई फीस नहीं मिली। उनसे वी. शांताराम ने वादा किया था कि जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर उन्हें हर महीने 105 रु. दिए जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब वी.शांताराम ने जीतेंद्र को 1964 में फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' से ब्रेक दिया और तब अपनी पहली फिल्म की फीस के तौर पर जीतेंद्र को 100 रु. मिले। 'गीत गाया पत्थरों ने' से जीतेंद्र को ब्रेक तो मिला, लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। ऐसे में जीतेंद्र को फिर छोटे-मोटे रोल करके गुजारा करना पड़ा। हालांकि, उनके मन में अब भी सोलो लीडिंग स्टार बनने की तमन्ना थी। 1967 में रिलीज हुई ‘फर्ज’ जीतेंद्र के करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई, लेकिन बतौर लीड स्टार फिल्म इंडस्ट्री में जमना उनके लिए आसान नहीं था। सोलो लीड हीरो बनाने से पहले डायरेक्टर ने रखी जीतेंद्र के सामने शर्त एक बार फिल्ममेकर सुबोध मुखर्जी ने जीतेंद्र से कहा कि वो उन्हें लेकर एक सोलो हीरो फिल्म बनाना चाहते हैं। जीतेंद्र खुश हो गए, लेकिन तभी सुबोध ने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा- मैं फिल्म तभी बनाऊंगा, जब हेमा मालिनी इस फिल्म में काम करेंगी। दरअसल, उस दौर में हेमा मालिनी का स्टारडम किसी मेल सुपरस्टार से कम नहीं था। हेमा जिस फिल्म में होती थीं, उसके सफल होने की गारंटी 100% रहती थी। जीतेंद्र भी ये बात भांप गए कि अगर हेमा उनकी हीरोइन बन जाएं तो उनकी भी नैया पार लग जाएगी और वो भी बतौर हीरो स्थापित हो जाएंगे। मगर ये इतना आसान नहीं था। उस समय हेमा के करियर के फैसले उनकी मां जया चक्रवर्ती लेती थीं। जब जीतेंद्र ने उन्हें फिल्म के बारे में बताया तो उन्होंने मना कर दिया। जीतेंद्र उनके पीछे पड़ गए और कहा-आपकी बेटी अगर मेरे साथ फिल्म कर लेगी तो मेरा करियर बन जाएगा। आखिरकार जया मान गईं। जीतेंद्र ने ये बात सुबोध मुखर्जी को बताई और उन्होंने झट से हेमा को फिल्म में साइन कर लिया। हेमा को साइन करके डायरेक्टर ने जीतेंद्र को किया फिल्म से बाहर आगे मामले में ट्विस्ट तब आया जब सुबोध मुखर्जी ने फिल्म में जीतेंद्र के बजाए शशि कपूर को हीरो के तौर पर साइन कर लिया। ये बात जानकर जीतेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई, जब उन्होंने सुबोध से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, 'फिल्म के प्रोड्यूसर और फाइनेंसर ने कहा है कि जब हीरोइन हेमा मालिनी है तो हीरो भी बड़ा कास्ट करो, जीतेंद्र को लेने की क्या जरूरत। इसलिए मैंने शशि कपूर के साथ फिल्म अनाउंस कर दी।' जीतेंद्र ने जब सुबोध से कहा कि हेमा मेरी वजह से फिल्म में आई हैं तो उन्होंने दो टूक कह दिया कि हम यहां बिजनेस करने बैठे हैं। जीतेंद्र इस बात से मायूस हो गए लेकिन इसी दौरान एल.वी प्रसाद ने उन्हें फिल्म 'जीने की राह' का ऑफर दिया। ये फिल्म सुपरहिट हो गई और जीतेंद्र चमक गए जबकि हेमा और शशि कपूर स्टारर फिल्म 'अभिनेत्री' बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई। हेमा की मां जीतेंद्र से करवाना चाहती थीं बेटी की शादी जब जीतेंद्र बड़े स्टार बन गए तो हेमा की मां जया चक्रवर्ती को वे अपनी बेटी के लिए परफेक्ट लगे। जया, हेमा की उनसे शादी करवाना चाहती थीं। दरअसल, तब हेमा का अफेयर धर्मेंद्र से चल रहा था और संजीव कुमार भी हेमा से शादी का प्रस्ताव उनके घरवालों के सामने रख चुके थे। हेमा की मां को न संजीव कुमार पसंद थे और न ही धर्मेंद्र। वे नहीं चाहती थीं कि हेमा की इन दोनों में से किसी स्टार से शादी हो जबकि जीतेंद्र उन्हें बेटी के लिए पसंद थे। जया चक्रवर्ती ने बेटी हेमा की शादी जीतेंद्र से फिक्स कर दी थी और चेन्नई में दोनों सात फेरे भी लेने वाले थे। तभी धर्मेंद्र शादी के मंडप में जीतेंद्र की गर्लफ्रेंड शोभा को लेकर पहुंच गए और हेमा से उनकी शादी तुड़वा दी थी। इसके कुछ साल बाद जीतेंद्र ने 1974 में गर्लफ्रेंड शोभा से लव मैरिज कर ली थी। श्रीदेवी के साथ हर फिल्म में काम करना चाहते थे जीतेंद्र 1983 में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ पहली बार काम किया था। दोनों की जोड़ी को काफी पसंद किया गया। यही वजह है कि एक दौर ऐसा आया जब जीतेंद्र हर फिल्म में केवल श्रीदेवी के साथ ही काम करना चाहते थे। शक्ति कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'जीतेंद्र को 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी का काम इतना पसंद आया था कि उन्होंने डायरेक्टर राघवेंद्र से कहा कि वे अपनी सभी फिल्मों में उनके अपोजिट केवल श्रीदेवी को बतौर हीरोइन साइन करें।' यही वजह थी कि 'हिम्मतवाला' के बाद राघवेंद्र राव ने जब 'जानी दोस्त' (1983), 'जस्टिस चौधरी' (1983), 'तोहफा' (1984), 'सुहागन' (1986), 'धर्माधिकारी' (1986) और 'दिल लगाके देखो' (1988) फिल्में बनाईं तो उन्होंने इनमें श्रीदेवी को ही लिया। जीतेंद्र को रेखा ने दी थी श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ काम करने के बारे में बात की थी। उन्होंने कहा था, 'श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह मुझे रेखा ने दी थी। एक दिन मैं और रेखा, श्रीदेवी की कोई तेलुगु फिल्म देख रहे थे। रेखा ने मुझसे कहा, 'तुम्हें श्रीदेवी के साथ जरूर काम करना चाहिए। उस वक्त रेखा के पास 'हिम्मतवाला' के लिए डेट्स नहीं थी। वे फिल्म में काम करने से मना कर चुकी थीं। ऐसे में मैंने राघवेंद्र राव को श्रीदेवी को कास्ट करने का सुझाव दिया और वे मान गए। इस तरह 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी की एंट्री हुई। श्रीदेवी का डांस में कोई मुकाबला नहीं था। जब 'हिम्मतवाला' की शूटिंग के दौरान डांस मास्टर हमें स्टेप्स सिखाते थे तो श्रीदेवी केवल दो रिहर्सल में ही स्टेप्स सीख जाती थीं और मैं कई बार प्रैक्टिस करता था लेकिन वे भी मेरे साथ तब तक रिहर्सल करती थीं, जब तक मैं अपना डांस स्टेप परफेक्ट तरीके से न कर लूं।' 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया 1975 के आसपास जब जीतेंद्र को बतौर हीरो फिल्में मिलना बंद हो गईं तो उनकी फाइनेंशियल कंडीशन काफी खराब हो गई थी। इसके बाद जीतेंद्र दूसरी बार तब दिवालिया हुए जब उन्होंने फिल्म प्रोड्यूस करने के बारे में सोचा। 1982 में उन्होंने फिल्म 'दीदार-ए-यार' बनाई जो कि फ्लॉप साबित हुई। इससे जीतेंद्र को काफी नुकसान हुआ। खराब आर्थिक स्थिति से उबरने के लिए जीतेंद्र ने 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया। जीतेंद्र के इतनी फिल्में करने पर लोग उन्हें इनसिक्योर एक्टर तक कहने लगे थे, लेकिन जीतेंद्र को इसमें कुछ गलत नहीं लगता। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैंने 8 साल में लगातार 60 फिल्में इसलिए कीं, क्योंकि ये सच है कि 1980 के दौर में मैं काफी इनसिक्योर था। मैं गोरेगांव की चॉल से उठा व्यक्ति हूं। मैंने वो समय देखा है, जब मेरे घर में पंखा लगा था तो पूरी चॉल के लोग उसे देखने के लिए आए थे। मैंने बुरा दौर करीब से देखा है, इसलिए मैं पागलों की तरह काम करता था।' मैं जॉबलैस हूं' जीतेंद्र 23 साल से फिल्मों से दूर हैं, लेकिन इसके बावजूद वे 1512 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपने प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स, ऑल्ट बालाजी और बालाजी मोशन पिक्चर के जरिए उनकी सालाना कमाई 300 करोड़ रु. तक है। जीतेंद्र ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था, '20 से ज्यादा साल हो गए, मैं जॉबलैस एक्टर हूं। मैंने अपना एक रुपया नहीं कमाया है। शोभा (पत्नी) और एकता (बेटी) सब काम संभालती हैं। मेरा योगदान केवल इतना है कि मैंने उस पैसे को सही जगह इन्वेस्ट किया है जो कि उन्होंने कमाया है और वो सारे इन्वेस्टमेंट मेरे लिए फायदेमंद साबित हुए हैं।' शराब-सिगरेट को 22 साल से हाथ नहीं लगाया जीतेंद्र ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे पहले खूब सिगरेट और शराब पीते थे, लेकिन 22 साल पहले ये सब छोड़ चुके हैं। जीतेंद्र ने कहा था-जवानी के दिनों में मैंने अपनी हेल्थ के साथ जितने खिलवाड़ करने थे, सब कर चुका। लेकिन जब मैं 60 साल का हुआ तो मैंने ये सब छोड़ दिया। लोग मुझे इस उम्र में भी फिट होने पर कॉम्प्लीमेंट देते हैं तो मैं उन्हें भी ये सब छोड़ने की सलाह देता हूं। आज के दौर में मुझे सलमान खान और ऋतिक रोशन की फिटनेस बहुत अच्छी लगती है।
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मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना राजस्थान सरकार की एक अहम पहल है, जिसमें 18 साल से कम उम्र के बच्चों को दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक मदद दी जाती है। इस योजना के तहत 56 दुर्लभ बिमारियों और 50 लाख रुपये तक बच्चों का इलाज मुफ्त कराया जाता है। साथ ही, जरूरी देखभाल के लिए हर महीने 5,000 रुपये की सहायता भी दी जाती है। यह योजना खासकर उन परिवारों के लिए है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते। सरकार का उद्देश्य ऐसे बच्चों को सही इलाज, देखभाल और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है ताकि उनका जीवन बेहतर हो सके और परिवार पर आर्थिक भार न पड़े। योजना का लाभ लेने के लिए बच्चे की उम्र 0 से 18 वर्ष के बीच होनी चाहिए और वह राजस्थान का मूल निवासी हो या फिर कम से कम तीन साल से राज्य में रह रहा हो। बीमारी की पुष्टि के लिए कम से कम दो सरकारी मान्यता प्राप्त अस्पतालों की रिपोर्ट जरूरी होती है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना क्या है यह योजना 18 वर्ष से कम उम्र के उन बच्चों के लिए है जो किसी दुर्लभ बीमारी से पीड़ित हैं। ऐसे बच्चों को इलाज के लिए सरकार की ओर से आर्थिक मदद, मुफ्त इलाज और हर महीने सहायता राशि दी जाती है। इलाज सिर्फ उन अस्पतालों में होगा जिन्हें राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने तय किया है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का उद्देश्य दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्चों को सही इलाज, देखभाल और जरूरी सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराना। परिवार को लगातार आर्थिक सहायता देकर बच्चों का इलाज रुकने न देना। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की विशेषताएं 18 साल से कम सभी बच्चों के लिए लागू। राजस्थान के निवासी या 3 साल से ज्यादा समय से राज्य में रहने वाले आवेदन कर सकते हैं। 50 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज। हर महीने 5,000 रुपये की आर्थिक सहायता। बच्चा अन्य योजनाओं का लाभ भी ले सकता है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की पात्रता बच्चा 18 वर्ष से कम उम्र का होना चाहिए। आवेदक राजस्थान का मूल निवासी हो या कम से कम 3 साल से यहां रह रहा हो। बीमारी का सर्टिफिकेशन AIIMS जोधपुर या जेके लोन अस्पताल जयपुर में होगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के अनुदान और आर्थिक सहायता की शर्तें इस योजना के लिए एक विशेष निधि बनाई गई है, जिसमें सरकारी राशि, दान और CSR की राशि रखी जाएगी। बच्चे को 50 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज दिया जाएगा। हर बच्चे को 5,000 रुपये प्रति माह सहायता दी जाएगी। पालनकर्ता बदलने की स्थिति में जिला कलेक्टर 3 महीने के अंदर नया पालनकर्ता तय करेगा। सहायता राशि तभी मिलेगी जब इलाज Centre of Excellence में हुआ हो। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के जरूरी दस्तावेज बीमारी की रिपोर्ट पालनकर्ता की अंडरटेकिंग बच्चे और पालनकर्ता का आधार कार्ड बैंक खाता विवरण मोबाइल नंबर मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का आवेदन कैसे होगा पालनकर्ता ई-मित्र या अपनी एसएसओ आईडी से ऑनलाइन आवेदन करेगा। आधार और जनाधार से जानकारी अपने आप पोर्टल पर आ जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की आवेदन के बाद क्या होगा आवेदन अपने जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO) के पास जाएगा। सही पाए जाने पर आवेदन AIIMS जोधपुर या JK लोन जयपुर भेज दिया जाएगा। बच्चे को जांच के लिए बुलाने की तारीख और समय SMS से मिलेगा। बीमारी प्रमाणित होने पर ऑनलाइन प्रमाणपत्र जारी होगा। इसके आधार पर पोर्टल खुद ही सहायता मंजूरी का आदेश जारी कर देगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का साल में एक बार वेरीफिकेशन कैसे होगा पालनकर्ता को हर साल नवंबर–दिसंबर में वेरीफिकेशन कराना जरूरी है। यह काम ई-मित्र या ब्लॉक/जिला कार्यालय में होता है। इस स्थिति में वेरीफिकेशन की जरूरत नहीं होगीः अगर नवंबर–दिसंबर में पालनकर्ता ने पेंशन या राशन का बायोमेट्रिक/OTP वेरीफिकेशन कराया हो, तो दोबारा वेरीफिकेशन की जरूरत नहीं है। अगर बच्चा 3 महीने में एक बार AIIMS या JK लोन की OPD या IPD में आया हो और रिपोर्ट पोर्टल पर अपडेट हो गई हो, तब भी अलग वेरीफिकेशन नहीं करना पड़ेगा। अगर पालनकर्ता या बच्चा शारीरिक रूप से असमर्थ है, तो अधिकारी घर आकर वेरीफिकेशन करेंगे। नोटः समय पर वेरीफिकेशन न कराने पर जनवरी से भुगतान रुक जाएगा, लेकिन वेरीफिकेशन होने के बाद पूरा एरियर मिल जाएगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना बंद होने की शर्तें दो स्थितियों में सहायता बंद हो जाएगी— बच्चा बीमारी से ठीक हो जाए। बच्चे की मृत्यु हो जाए। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में पालनकर्ता को बदलना अगर पालनकर्ता की मृत्यु हो जाए या वह बच्चे को छोड़ दे तो जिला कलेक्टर नया पालनकर्ता नियुक्त करेगा। नया पालनकर्ता परिवार में सबसे नजदीकी रिश्तेदार होगा। बच्चे का नाम नए पालनकर्ता के जनाधार में जोड़ना जरूरी है। अगर कोई राशि पहले से मंजूर है और बंटी नहीं है, तो वह नए पालनकर्ता को दे दी जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में पैसा कैसे मिलेगा (स्वीकृति और भुगतान) बीमारी प्रमाणित होने के बाद पोर्टल से ऑटोमेटिक मंजूरी जारी होगी। पैसा दुर्लभ बीमारी कोष से दिया जाएगा। हर महीने एक तय तारीख को DBT के माध्यम से पालनकर्ता के जनाधार लिंक्ड खाते में राशि भेजी जाएगी। ई-बिल, ई-साइन और IFMS सिस्टम पोर्टल से जुड़े रहेंगे। आवेदन, मंजूरी और भुगतान की हर जानकारी एसएमएस से भेजी जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की मॉनिटरिंग योजना की देखरेख और निगरानी राज्य स्तर पर आयुक्त/निदेशक सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के नोडल अधिकारी करेंगे। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के नियमों में छूट अगर किसी मामले में नियमों में ढील की जरूरत हो, तो इसका अधिकार विभाग के आयुक्त/निदेशक, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से होंगे। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत इन बिमारियों को कवर किया जाएगा यह सभी दुर्लभ रोग योजना के तहत कवरेज किए जाते हैं ताकि बच्चों को महंगे इलाज, दवाइयों और जरूरी देखभाल में आर्थिक सहायता मिल सके। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना से जुड़े अन्य सवाल (FAQs) यह योजना किन बच्चों के लिए है? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना 18 साल से कम उम्र के दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्चों के लिए। कहां इलाज होगा? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत AIIMS जोधपुर या JK लोन जयपुर जैसे केंद्रों में। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत मासिक सहायता कितनी है? 5,000 रुपये प्रति माह। क्या आय सीमा है ? नहीं, मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में कोई आय सीमा नहीं है। पालनकर्ता बदलने पर क्या होगा? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत जिला कलेक्टर नया पालनकर्ता तय करेगा और सहायता जारी रहेगी।
मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा की केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी से मुलाकात
भूपाल नोबल्स विश्वविद्यालय का द्वितीय दीक्षांत समारोह आयोजित
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बहुत कुछ


मदन अरोड़ा.बिहार ने एक बार फिर भारतीय राजनीति को स्पष्ट संदेश दिया है. मतदाता अब किसी भी नकारात्मक प्रचार, जातीय जहर या हवाई वादों से प्रभावित होने वाला नहीं है. इस चुनाव में न केवल गठबंधन ध्वस्त हुआ, बल्कि वह पूरा आख्यान भी धराशायी हो गया जो महीनों तक ‘वोट चोरी’, ‘नरेंद्र सरेंडर’ और ‘हर परिवार को नौकरी’ के नारों पर टिका था. राहुल–तेजस्वी का नकारात्मक कैंपेन और बंटाधार की राजनीति कहावत है—जहां-जहां पाँव पड़े संतन के, तहां तहां बंटाधार. बिहार में यह कहावत राजनीतिक रूप से इस बार राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर सटीक बैठती दिखी. राहुल गांधी का पीएम मोदी के खिलाफ ‘वोट चोरी’ अभियान और ‘चोरी का पीएम’ जैसी भाषा न केवल मतदाताओं को अखरी, बल्कि इससे गठबंधन की विश्वसनीयता भी तार-तार हो गई. दूसरी ओर तेजस्वी यादव जो ताजपोशी के सपने देख रहे थे—राहुल गांधी के कटु और नकारात्मक प्रचार की वजह से खुद भी डूब गए. प्रधानमंत्री मोदी जिस “ऐतिहासिक प्रचण्ड जीत” का दावा कर रहे थे, बिहार के मतदाताओं ने उस पर भरोसा दिखाते हुए एनडीए को 2010 की तरह एक बार फिर प्रचण्ड बहुमत दे दिया. नीतीश–मोदी की जोड़ी राहुल–तेजस्वी पर भारी पड़ी. तेजस्वी के वादे हुए फेल तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों से लेकर हर परिवार को नौकरी, जनवरी से 30 हजार रुपये और दीदियों के लिए पैकेज जैसे बड़े वादे किए. लेकिन मतदाता समझ गया कि ये वादे ज़मीन से ज्यादा हवा में बने थे. इसके उलट नीतीश–मोदी सरकार द्वारा पहले से चल रहे महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों पर महिलाओं ने भरोसा दिखाया. * लगभग डेढ़ करोड़ ‘दीदियों’ ने तेजस्वी के वादों से प्रभावित होने के बजाय उस स्थिर नीति को प्राथमिकता दी जो उन्हें वर्षों में मिली थी. * महिला–युवा के नए एमवाई गठबंधन का जादू चला, और पारंपरिक मुस्लिम–यादव (एमवाई) समीकरण बिखर गया. एमवाई समीकरण की मौत: मुस्लिम–यादव वोट क्यों खिसके? महागठबंधन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल रही—मुस्लिम डिप्टी सीएम की घोषणा न करना. ओवैसी ने इसे भुनाते हुए खुलकर कहा कि गठबंधन “मुसलमानों को सिर्फ दरी बिछाने वाला” समझता है. यह बयान मुस्लिम वोटों के लिए निर्णायक साबित हुआ. इसी तरह यादवों के भीतर यह नाराज़गी गहराती गई कि सीएम और पार्टी अध्यक्ष पद पर लालू परिवार का एकाधिकार जारी है और यादव समाज केवल परिवारवादी राजनीति का उपकरण बनकर रह गया है. इस असंतोष का फायदा एनडीए को मिला. नक्सलवाद, सुरक्षा और एस आई आर का प्रभाव बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों में पिछले वर्षों में नक्सलवाद लगभग समाप्त हुआ है. नक्सली भय खत्म होने से वामपंथी दलों का प्रभाव टूटा और सुरक्षा को लेकर भाजपा के प्रति भरोसा मजबूत हुआ. उधर एस आई आर(वोटर सूची शुद्धिकरण) का अप्रत्यक्ष प्रभाव भी दिखा— घुसपैठियों के वोट कटने से गठबंधन के कोर वोट बैंक पर चोट पहुंची.इससे मुस्लिम बहुल इलाकों में एनडीए की पैठ मजबूत हुई. साथ ही दिल्ली में मतदान से एक दिन पहले हुए विस्फोट ने हिंदू मतदाताओं में सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा की, जिसका सीधा लाभ एनडीए को मिला. मोदी–योगी–शाह की तिकड़ी ने बदला खेल मोदी का राष्ट्रवाद, योगी की सनातनी हुंकार, और अमित शाह की जंगलराज की वापसी न होने देने की चेतावनी ने जमीन पर गहरी पकड़ बनाई. इनकी रैलियों में उमड़ा अभूतपूर्व जनसैलाब पहले ही संकेत दे चुका था कि हवा किस दिशा में बह रही है. गठबंधन की हार का सार महागठबंधन की करारी हार कई बातों का मिला-जुला परिणाम है— 1. वोट चोरी का नकारात्मक अभियान उल्टा पड़ा. 2. मुस्लिम डिप्टी सीएम घोषित न करने की भारी गलती हुई. 3. यादव वोटों का लालू परिवार के खिलाफ फिसलना. 4. ओवैसी द्वारा मुस्लिम मतदाताओं का खिंचाव. 5. एस आई आर से घुसपैठियों के वोट कटना. 6. नक्सलवाद पर सरकार की सफलता. 7. फर्जी वादे बनाम वास्तविक विकास. 8. मोदी–योगी–शाह की आक्रामक और प्रभावी चुनावी रणनीति. बिहार का संदेश: राष्ट्रवाद और विकास ही निर्णायक मुद्दे इस चुनाव ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि— * राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति में सर्वोच्च मुद्दा है. * सनातन पर चोट या तुष्टिकरण अब स्वीकार नहीं. * मतदाता जातियों में बंटने के प्रयास को अस्वीकार करता है. * घुसपैठिया संरक्षण की राजनीति नहीं चलेगी. * मतदाता जानता है कि किसने जमीन पर काम किया और किसने हवा में सपने बेचे. बिहार का जनादेश यह भी बताता है कि वोट बैंक की राजनीति का आख्यान टूट रहा है. मुसलमानों और यादवों दोनों ने दिखा दिया कि वे किसी भी परिवार या दल के बंधक नहीं हैं. विपक्ष अब क्या करेगा? हार के तुरंत बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया है. “बिहार में वोट चोरी नहीं—डकैती हुई है” जैसे बयान सामने आ रहे हैं. संभावना है कि विपक्ष— * हरियाणा के CM के पुराने बयान * पीएम मोदी का ‘ऐतिहासिक जीत’ वाला वक्तव्य * अमित शाह के 160 सीटों से ज्यादा सीटों के अनुमान को मिलाकर एक नया ‘वोट चोरी’ नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश करे. लेकिन इसमें सबसे बड़ा खतरा है—जनादेश का अपमान होगा.खासतौर पर जेन-ज़ी को उकसाकर सड़कों पर उतारने की कोशिश राजनीतिक स्थिति को अस्थिर कर सकती है. बिहार का यह परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भारतीय मतदाता की परिपक्वता और राजनीतिक जागरूकता का प्रमाण है. मतदाता अब स्पष्ट रूप से बता चुका है कि— * वह राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखता है. * बिना आधार वाले आरोपों को नहीं मानता. * हवा हवाई वादों के बजाय परिणाम देखता है. * और, सबसे बढ़कर, वह अब किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार से बरगलाने वाला नहीं है. राहुल–तेजस्वी महा गठबंधन का बिखरना इस बात का संकेत है कि परिवारवादी राजनीति, तुष्टिकरण और नकारात्मक प्रचार की राजनीति की उम्र अब समाप्ति पर है. विकास, सुरक्षा और स्थिरता की राजनीति ही भविष्य का रास्ता है और बिहार ने इस राह को एक बार फिर रोशनी दे दी है.यह चुनाव परिणाम अखिलेश यादव और ममता बनर्जी के लिए भी खतरे की घंटी है.
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वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। हालांकि, भारत ने आधिकारिक रूप से इस दावे पर कोई टिप्पणी नहीं की है। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने समझौते की पुष्टि की है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दोनों देशों से बात की थी इसके बाद से माना जा रहा था कि दोनों देशों में शायद तनाव कम हो। ट्रंप ने क्या बताया? ट्रंप ने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा, " संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता में एक लंबी रात तक चली बातचीत के बाद, मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। दोनों देशों को सामान्य बुद्धि और महान बुद्धिमत्ता का उपयोग करने के लिए बधाई। इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद।" अमेरिकी विदेश मंत्री ने बताया कैसे हुई डील पिछले 48 घंटों में, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और मैंने वरिष्ठ भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ बातचीत की है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ, विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर, सेनाध्यक्ष असीम मुनीर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और असीम मलिक शामिल हैं। मुझे यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गई हैं तथा तटस्थ स्थल पर व्यापक मुद्दों पर वार्ता शुरू करने पर सहमत हो गई हैं। हम शांति का मार्ग चुनने में प्रधानमंत्री मोदी और शरीफ की बुद्धिमत्ता, विवेक और कूटनीति की सराहना करते हैं।
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