हनुमानगढ़


आचार संहिता की चेतावनी के बीच चुनावी गलियारों में धनबल की चर्चा तेज, वार्ड 17 और 11 बने प्रतिष्ठा की जंग का केंद्र हनुमानगढ़. मदन अरोड़ा.नगर निकाय चुनाव में आदर्श आचार संहिता लागू है. आदर्श आचार संहिता प्रभारी एवं जिला परिषद सीईओ श्रद्धा गोमे ने सभी प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग के निर्धारित नियमों की पालना करने की हिदायत दी है. साफ चेतावनी है कि वोट के बदले किसी तरह का लालच देना प्रत्याशी को भारी पड़ सकता है और शिकायत मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी. चेतावनी जरूरी है, लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है,क्या केवल नियम और चेतावनी चुनाव में धनबल को रोक पाएंगे? विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरह पानी की तरह पैसा बहाए जाने, शराब और अन्य नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की चर्चाएं आम थीं, उन्हें लोग आज भी भूले नहीं हैं. चुनाव जीतने की होड़ में जब येन-केन-प्रकारेण जीत हासिल करना ही अंतिम लक्ष्य बन जाए और मतदाता का एक वर्ग अपने वोट की कीमत लगाने लगे, तब आदर्श आचार संहिता के नियम कागज पर कितने भी सख्त हों, जमीन पर उनकी परीक्षा कहीं अधिक कठिन हो जाती है. चुनावी चर्चा का पुराना अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ पूर्व में हुए एक विधानसभा चुनाव के समय भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर की चर्चा थी. उस दौरान यह राजनीतिक चर्चा भी खूब चली कि बाहर से आए रणनीतिकारों को चुनावी गणित समझ आने के बाद धनबल का सहारा लेना पड़ा और चुनाव में जमकर पैसा लगाया गया. उस चुनाव के बाद दुर्गा कॉलोनी को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हुईं.कहा गया कि यहां मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयास हुए और लोगों ने अपने वोट की कीमत वसूली. इन चर्चाओं की वास्तविकता अलग विषय है, लेकिन यह पूरा घटनाक्रम यह सवाल जरूर छोड़ गया कि क्या चुनावी राजनीति में मतदाता और प्रत्याशी के बीच संबंध अब विचार और विकास के बजाय लेन-देन तक सिमटते जा रहे हैं? हर क्षेत्र में स्वाभिमानी और अपने जमीर पर कायम रहने वाले लोग होते हैं. लेकिन हर समाज में ऐसे लोग भी होते हैं जो तत्काल लाभ के लिए अपने वोट का सौदा करने को तैयार हो जाते हैं. कोई शराब के लिए, कोई पैसे के लिए और कोई किसी अन्य वस्तु या व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने मताधिकार को प्रभावित होने देता है. चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार और उनके रणनीतिकार ऐसे मतदाताओं को सबसे पहले पहचानने की कोशिश करते हैं.यही चुनावी राजनीति का सबसे चिंताजनक पक्ष है. अब वार्ड 17 और 11 पर टिकी सबसे ज्यादा निगाहें नगर निकाय चुनाव में इस बार सबसे अधिक राजनीतिक प्रतिष्ठा जिन वार्डों से जुड़ी दिखाई दे रही है, उनमें वार्ड 17 और वार्ड 11 प्रमुख हैं. विधायक गणेश राज बंसल की पत्नी और बेटी के इन वार्डों से चुनाव मैदान में होने के कारण मुकाबला केवल पार्षद की सीट का नहीं रह गया है. स्वाभाविक रूप से इन दोनों वार्डों का परिणाम विधायक खेमे के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़ा माना जा रहा है. खासकर विधायक की पत्नी द्वारा वार्ड बदलकर चुनाव लड़ने के फैसले ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी है. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पहले जिस वार्ड से चुनाव लड़ने की तैयारी थी, वहां परिस्थितियां अनुकूल नहीं दिखने के कारण वार्ड बदलने का निर्णय लिया गया. यह चर्चा सही है या राजनीतिक कयास,इसका फैसला तो परिणाम ही करेगा. लेकिन इतना जरूर है कि वार्ड 17 और 11 अब सामान्य वार्ड नहीं रह गए हैं. भाजपा-कांग्रेस टिकट और गुटबाजी में उलझीं, विधायक खेमा मैदान में रणनीति के साथ एक तरफ भाजपा और कांग्रेस टिकट वितरण, भीतरघात और बागियों से जूझती दिखाई दे रही हैं. दूसरी ओर विधायक गणेश राज बंसल का खेमा अपने स्तर पर चुनावी रणनीति बनाने और उसे जमीन पर उतारने में जुटा हुआ है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विधायक खेमा भाजपा और कांग्रेस के उन मजबूत बागियों पर नजर रख रहा है, जो अपनी-अपनी पार्टियों से नाराज होकर निर्दलीय मैदान में उतर गए हैं अथवा टिकट की घोषणा के बाद उतर सकते हैं. चर्चाएं यह भी हैं कि ऐसे प्रभावशाली उम्मीदवारों से संपर्क साधने के साथ उन्हें आर्थिक सहयोग और भविष्य में राजनीतिक समर्थन जैसे प्रस्ताव दिए जा रहे हैं. इसी तरह जिन निर्दलीय उम्मीदवारों को अपने क्षेत्र में मजबूत माना जा रहा है, लेकिन जिनके पास चुनाव लड़ने के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, उनके पीछे भी विधायक खेमे की आर्थिक मदद की चर्चाएं हैं. इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है, लेकिन चुनावी समीकरणों को समझने वालों के लिए यह रणनीति नई नहीं है. कमजोर प्रतिद्वंद्वी को मजबूत मानकर रणनीति बनाना और मजबूत प्रतिद्वंद्वी को संसाधनों से कमजोर करने की कोशिश,चुनावी राजनीति में यही रणनीतिक सोच कई बार परिणाम बदल देती है. 15 ± 5 सीटों का अनुमान और बोर्ड बनाने का गणित चुनावी माहौल और अब तक के समीकरणों को देखते हुए राजनीतिक चर्चाओं में विधायक खेमे के खाते में लगभग 15 ± 5 सीटों का अनुमान लगाया जा रहा है. यह कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक समीकरणों पर आधारित अनुमान है. सीधे बहुमत तक पहुंचना विधायक खेमे के लिए आसान दिखाई नहीं देता. लेकिन राजनीति केवल बहुमत हासिल करने का नाम नहीं है.बहुमत न होने के बावजूद बोर्ड बनाना भी राजनीति का ही एक गणित है. मजबूत निर्दलीयों और बागियों को अपने पक्ष में करने, चुनाव बाद राजनीतिक संपर्कों और जरूरत पड़ने पर अन्य पार्षदों के समर्थन से बोर्ड बनाने की रणनीति पर भी चर्चाएं हैं. इसमें चांदीराम की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक हलकों में कयास लगाए जा रहे हैं. यानी लड़ाई केवल चुनाव जीतने की नहीं है.असल लड़ाई चुनाव परिणाम के बाद बोर्ड के आंकड़े जुटाने की भी होगी. अब असली परीक्षा चुनाव आयोग और प्रशासन की यहीं से आदर्श आचार संहिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है.प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि वोट के बदले लालच देने वालों के खिलाफ शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव अधिकारी केवल शिकायत का इंतजार करेंगे या धनबल, शराब और अन्य प्रलोभनों की रोकथाम के लिए सक्रिय निगरानी भी करेंगे? क्या संवेदनशील वार्डों को चिन्हित किया गया है? क्या चुनाव खर्च पर वास्तविक निगरानी होगी? क्या रात के समय होने वाले संदिग्ध लेन-देन, शराब वितरण अथवा मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयासों पर नजर रखी जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल,क्या चुनावी मैदान में उतरने वाले धनबल को शिकायत होने से पहले पहचानने की कोई प्रभावी व्यवस्था है? क्योंकि अगर शिकायतकर्ता सामने आने का इंतजार किया गया तो अक्सर तब तक बहुत कुछ हो चुका होता है. बोर्ड का रास्ता ईवीएम नहीं, चुनाव बाद की राजनीति भी तय करेगी इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के लिए केवल अपने अधिकृत प्रत्याशियों को जिताना चुनौती नहीं है. उससे बड़ी चुनौती अपने बागियों को रोकना और चुनाव जीतने के बाद अपने पार्षदों को साथ बनाए रखना होगी. वहीं विधायक खेमा यदि अपने अनुमान के आसपास सीटें हासिल कर लेता है तो उसके सामने अगला लक्ष्य बोर्ड बनाने का होगा. ऐसे में निर्दलीय और बागी पार्षद चुनाव परिणाम के बाद सबसे महत्वपूर्ण किरदार बन सकते हैं. यही वजह है कि इस बार नगर निकाय चुनाव का परिणाम केवल यह नहीं बताएगा कि किस पार्टी के कितने प्रत्याशी जीते. परिणाम यह भी बताएगा कि किसके पास कितने पार्षद हैं और उन पार्षदों को अपने साथ रखने की राजनीतिक क्षमता किसके पास है. आदर्श आचार संहिता की चेतावनी के बीच अब प्रशासन की परीक्षा है कि वह चुनाव को पैसे, शराब और प्रलोभन से मुक्त रखने में कितना सफल होता है और राजनीतिक दलों की परीक्षा यह है कि वे मतदाता को उसके वोट की ताकत समझाते हैं या फिर उसी वोट की कीमत लगाने की राजनीति को स्वीकार करते हैं. क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महंगा सौदा वह होता है जिसमें पांच साल का भविष्य कुछ घंटों के लालच के बदले बेच दिया जाता है. इसलिए इस चुनाव में सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि कौन जीतेगा? सवाल यह भी है कि कितना पैसा बहेगा, कितना धनबल परिणाम को प्रभावित करेगा और चुनाव आयोग उस धनबल को रोकने में कितना सफल होगा. क्योंकि अंततः बोर्ड का गणित केवल सीटों से नहीं, चुनाव में इस्तेमाल हुए धनबल और चुनाव बाद होने वाली राजनीतिक जोड़-तोड़ से भी तय होने वाला है.
जेन जेन ज़ी बनाम पुरानी सियासत: इस बार वार्ड अपना फैसला खुद लिखेगा?ज़ी बनाम पुरानी सियासत: इस बार वार्ड अपना फैसला खुद लिखेगा?
हनुमानगढ़ नगर परिषद चुनाव : कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर, आरक्षण लॉटरी ने खोले किस्मत के दरवाजे
गोदी बदलने वालों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल,किसके भरोसे मांगें टिकट? भाजपा में एंट्री के बाद शक्ति प्रदर्शन, संगठन बनाम विधायक खेमे की जंग हुई तेज
अब समय है -सम्मान, स्मृति और न्याय का

hot news


बॉलीवुड के बीते जमाने के स्टार जीतेंद्र आज 82 साल के हो गए। तकरीबन चार दशक लंबे करियर में जीतेंद्र ने 'तोहफा', 'हिम्मतवाला', 'कारवां', 'परिचय', 'मवाली' समेत कई हिट फिल्मों में काम किया है। अपने अनोखे डांसिंग स्टाइल की वजह से लोग उन्हें जंपिंग जैक बुलाते थे। जीतेंद्र ने करीब 121 हिट फिल्में दीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कभी बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला। कभी 8 साल में 60 फिल्मों में काम करने वाले जीतेंद्र तकरीबन 23 साल पहले एक्टिंग छोड़ चुके हैं। 2001 में उन्हें फिल्म ‘कुछ तो है’ में देखा गया था। इसके बाद वो कुछ टीवी सीरियलों और वेब सीरीज में चंद मिनट के लिए ही नजर आए हैं। एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने तो ये तक कहा था कि उन्हें याद ही नहीं है कि वे कभी एक्टर थे। वैसे, एक्टिंग के अलावा जीतेंद्र ने प्रोडक्शन हाउस से भी मोटी कमाई की, लेकिन फिल्में प्रोड्यूस करते हुए जीतेंद्र दो बार दिवालिया भी हो गए थे। जीतेंद्र ने तब भी हार नहीं मानी और आज उनकी संपत्ति 1512 करोड़ रुपए है। जन्मदिन के मौके पर जानते हैं जीतेंद्र की लाइफ के कुछ दिलचस्प किस्से… राजेश खन्ना थे जीतेंद्र के क्लासमेट जीतेंद्र का जन्म 7 अप्रैल 1942 को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था। उनका असली नाम रवि कपूर है। जीतेंद्र के पिता अमरनाथ फिल्म इंडस्ट्री में नकली ज्वेलरी सप्लाई करने का काम करते थे, इसलिए पूरी फैमिली अमृतसर से मुंबई आकर बस गई थी। जीतेंद्र की शुरुआती पढ़ाई सेंट सेबेस्टियन गोअन हाई स्कूल, मुंबई में हुई थी। इसी स्कूल में उनके साथ राजेश खन्ना भी पढ़ते थे और दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। जीतेंद्र ने आगे की पढ़ाई मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज से पूरी की। ज्वेलरी सप्लाई करते-करते बने बॉडी डबल जीतेंद्र जब बड़े हुए तो अपने पिता के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। इसी सिलसिले में एक दिन वे फिल्ममेकर वी शांताराम से मिले। फिर अक्सर ज्वेलरी सप्लाई के सिलसिले में जीतेंद्र का शांताराम की फिल्म कंपनी में आना-जाना लगा रहता था। इसी दौरान उनके मन में हीरो बनने की इच्छा जाग गई। उन्होंने वी शांताराम से किसी फिल्म की शूटिंग देखने की इच्छा जताई। शांताराम ने कहा-सिर्फ शूटिंग देखने से काम नहीं चलेगा। काम करोगे? जीतेंद्र ने तुरंत हामी भर दी। फिल्म 'नवरंग' की शूटिंग के दौरान जीतेंद्र को छोटे-मोटे काम मिल जाया करते थे। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब जीतेंद्र की किस्मत चमक गई। ये किस्सा उन्होंने खुद 'द कपिल शर्मा शो' के दौरान सुनाया था। जब कपिल शर्मा ने उनसे पूछा था कि क्या आप स्ट्रगल के दिनों में हीरोइन के बॉडी डबल बने थे? इस पर जीतेंद्र ने कहा था, हां, मैं फिल्म 'सेहरा' की शूटिंग के दौरान जूनियर आर्टिस्ट था। मुझे शांताराम जी की चमचागिरी करनी पड़ती थी, मैं उस वक्त कुछ भी करने को तैयार था। तो एक दिन बीकानेर में शूटिंग के वक्त हीरोइन संध्या जी की कोई बॉडी डबल नहीं मिल रही थी। शांताराम जी ने मुझे संध्या जी का बॉडी डबल बना दिया और इस तरह मेरी फिल्मों में एंट्री हुई। पहली फिल्म की फीस थी 100 रु. शुरुआत में जीतेंद्र को काम तो मिला लेकिन छह महीने तक कोई फीस नहीं मिली। उनसे वी. शांताराम ने वादा किया था कि जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर उन्हें हर महीने 105 रु. दिए जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब वी.शांताराम ने जीतेंद्र को 1964 में फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' से ब्रेक दिया और तब अपनी पहली फिल्म की फीस के तौर पर जीतेंद्र को 100 रु. मिले। 'गीत गाया पत्थरों ने' से जीतेंद्र को ब्रेक तो मिला, लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। ऐसे में जीतेंद्र को फिर छोटे-मोटे रोल करके गुजारा करना पड़ा। हालांकि, उनके मन में अब भी सोलो लीडिंग स्टार बनने की तमन्ना थी। 1967 में रिलीज हुई ‘फर्ज’ जीतेंद्र के करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई, लेकिन बतौर लीड स्टार फिल्म इंडस्ट्री में जमना उनके लिए आसान नहीं था। सोलो लीड हीरो बनाने से पहले डायरेक्टर ने रखी जीतेंद्र के सामने शर्त एक बार फिल्ममेकर सुबोध मुखर्जी ने जीतेंद्र से कहा कि वो उन्हें लेकर एक सोलो हीरो फिल्म बनाना चाहते हैं। जीतेंद्र खुश हो गए, लेकिन तभी सुबोध ने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा- मैं फिल्म तभी बनाऊंगा, जब हेमा मालिनी इस फिल्म में काम करेंगी। दरअसल, उस दौर में हेमा मालिनी का स्टारडम किसी मेल सुपरस्टार से कम नहीं था। हेमा जिस फिल्म में होती थीं, उसके सफल होने की गारंटी 100% रहती थी। जीतेंद्र भी ये बात भांप गए कि अगर हेमा उनकी हीरोइन बन जाएं तो उनकी भी नैया पार लग जाएगी और वो भी बतौर हीरो स्थापित हो जाएंगे। मगर ये इतना आसान नहीं था। उस समय हेमा के करियर के फैसले उनकी मां जया चक्रवर्ती लेती थीं। जब जीतेंद्र ने उन्हें फिल्म के बारे में बताया तो उन्होंने मना कर दिया। जीतेंद्र उनके पीछे पड़ गए और कहा-आपकी बेटी अगर मेरे साथ फिल्म कर लेगी तो मेरा करियर बन जाएगा। आखिरकार जया मान गईं। जीतेंद्र ने ये बात सुबोध मुखर्जी को बताई और उन्होंने झट से हेमा को फिल्म में साइन कर लिया। हेमा को साइन करके डायरेक्टर ने जीतेंद्र को किया फिल्म से बाहर आगे मामले में ट्विस्ट तब आया जब सुबोध मुखर्जी ने फिल्म में जीतेंद्र के बजाए शशि कपूर को हीरो के तौर पर साइन कर लिया। ये बात जानकर जीतेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई, जब उन्होंने सुबोध से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, 'फिल्म के प्रोड्यूसर और फाइनेंसर ने कहा है कि जब हीरोइन हेमा मालिनी है तो हीरो भी बड़ा कास्ट करो, जीतेंद्र को लेने की क्या जरूरत। इसलिए मैंने शशि कपूर के साथ फिल्म अनाउंस कर दी।' जीतेंद्र ने जब सुबोध से कहा कि हेमा मेरी वजह से फिल्म में आई हैं तो उन्होंने दो टूक कह दिया कि हम यहां बिजनेस करने बैठे हैं। जीतेंद्र इस बात से मायूस हो गए लेकिन इसी दौरान एल.वी प्रसाद ने उन्हें फिल्म 'जीने की राह' का ऑफर दिया। ये फिल्म सुपरहिट हो गई और जीतेंद्र चमक गए जबकि हेमा और शशि कपूर स्टारर फिल्म 'अभिनेत्री' बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई। हेमा की मां जीतेंद्र से करवाना चाहती थीं बेटी की शादी जब जीतेंद्र बड़े स्टार बन गए तो हेमा की मां जया चक्रवर्ती को वे अपनी बेटी के लिए परफेक्ट लगे। जया, हेमा की उनसे शादी करवाना चाहती थीं। दरअसल, तब हेमा का अफेयर धर्मेंद्र से चल रहा था और संजीव कुमार भी हेमा से शादी का प्रस्ताव उनके घरवालों के सामने रख चुके थे। हेमा की मां को न संजीव कुमार पसंद थे और न ही धर्मेंद्र। वे नहीं चाहती थीं कि हेमा की इन दोनों में से किसी स्टार से शादी हो जबकि जीतेंद्र उन्हें बेटी के लिए पसंद थे। जया चक्रवर्ती ने बेटी हेमा की शादी जीतेंद्र से फिक्स कर दी थी और चेन्नई में दोनों सात फेरे भी लेने वाले थे। तभी धर्मेंद्र शादी के मंडप में जीतेंद्र की गर्लफ्रेंड शोभा को लेकर पहुंच गए और हेमा से उनकी शादी तुड़वा दी थी। इसके कुछ साल बाद जीतेंद्र ने 1974 में गर्लफ्रेंड शोभा से लव मैरिज कर ली थी। श्रीदेवी के साथ हर फिल्म में काम करना चाहते थे जीतेंद्र 1983 में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ पहली बार काम किया था। दोनों की जोड़ी को काफी पसंद किया गया। यही वजह है कि एक दौर ऐसा आया जब जीतेंद्र हर फिल्म में केवल श्रीदेवी के साथ ही काम करना चाहते थे। शक्ति कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'जीतेंद्र को 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी का काम इतना पसंद आया था कि उन्होंने डायरेक्टर राघवेंद्र से कहा कि वे अपनी सभी फिल्मों में उनके अपोजिट केवल श्रीदेवी को बतौर हीरोइन साइन करें।' यही वजह थी कि 'हिम्मतवाला' के बाद राघवेंद्र राव ने जब 'जानी दोस्त' (1983), 'जस्टिस चौधरी' (1983), 'तोहफा' (1984), 'सुहागन' (1986), 'धर्माधिकारी' (1986) और 'दिल लगाके देखो' (1988) फिल्में बनाईं तो उन्होंने इनमें श्रीदेवी को ही लिया। जीतेंद्र को रेखा ने दी थी श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ काम करने के बारे में बात की थी। उन्होंने कहा था, 'श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह मुझे रेखा ने दी थी। एक दिन मैं और रेखा, श्रीदेवी की कोई तेलुगु फिल्म देख रहे थे। रेखा ने मुझसे कहा, 'तुम्हें श्रीदेवी के साथ जरूर काम करना चाहिए। उस वक्त रेखा के पास 'हिम्मतवाला' के लिए डेट्स नहीं थी। वे फिल्म में काम करने से मना कर चुकी थीं। ऐसे में मैंने राघवेंद्र राव को श्रीदेवी को कास्ट करने का सुझाव दिया और वे मान गए। इस तरह 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी की एंट्री हुई। श्रीदेवी का डांस में कोई मुकाबला नहीं था। जब 'हिम्मतवाला' की शूटिंग के दौरान डांस मास्टर हमें स्टेप्स सिखाते थे तो श्रीदेवी केवल दो रिहर्सल में ही स्टेप्स सीख जाती थीं और मैं कई बार प्रैक्टिस करता था लेकिन वे भी मेरे साथ तब तक रिहर्सल करती थीं, जब तक मैं अपना डांस स्टेप परफेक्ट तरीके से न कर लूं।' 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया 1975 के आसपास जब जीतेंद्र को बतौर हीरो फिल्में मिलना बंद हो गईं तो उनकी फाइनेंशियल कंडीशन काफी खराब हो गई थी। इसके बाद जीतेंद्र दूसरी बार तब दिवालिया हुए जब उन्होंने फिल्म प्रोड्यूस करने के बारे में सोचा। 1982 में उन्होंने फिल्म 'दीदार-ए-यार' बनाई जो कि फ्लॉप साबित हुई। इससे जीतेंद्र को काफी नुकसान हुआ। खराब आर्थिक स्थिति से उबरने के लिए जीतेंद्र ने 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया। जीतेंद्र के इतनी फिल्में करने पर लोग उन्हें इनसिक्योर एक्टर तक कहने लगे थे, लेकिन जीतेंद्र को इसमें कुछ गलत नहीं लगता। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैंने 8 साल में लगातार 60 फिल्में इसलिए कीं, क्योंकि ये सच है कि 1980 के दौर में मैं काफी इनसिक्योर था। मैं गोरेगांव की चॉल से उठा व्यक्ति हूं। मैंने वो समय देखा है, जब मेरे घर में पंखा लगा था तो पूरी चॉल के लोग उसे देखने के लिए आए थे। मैंने बुरा दौर करीब से देखा है, इसलिए मैं पागलों की तरह काम करता था।' मैं जॉबलैस हूं' जीतेंद्र 23 साल से फिल्मों से दूर हैं, लेकिन इसके बावजूद वे 1512 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपने प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स, ऑल्ट बालाजी और बालाजी मोशन पिक्चर के जरिए उनकी सालाना कमाई 300 करोड़ रु. तक है। जीतेंद्र ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था, '20 से ज्यादा साल हो गए, मैं जॉबलैस एक्टर हूं। मैंने अपना एक रुपया नहीं कमाया है। शोभा (पत्नी) और एकता (बेटी) सब काम संभालती हैं। मेरा योगदान केवल इतना है कि मैंने उस पैसे को सही जगह इन्वेस्ट किया है जो कि उन्होंने कमाया है और वो सारे इन्वेस्टमेंट मेरे लिए फायदेमंद साबित हुए हैं।' शराब-सिगरेट को 22 साल से हाथ नहीं लगाया जीतेंद्र ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे पहले खूब सिगरेट और शराब पीते थे, लेकिन 22 साल पहले ये सब छोड़ चुके हैं। जीतेंद्र ने कहा था-जवानी के दिनों में मैंने अपनी हेल्थ के साथ जितने खिलवाड़ करने थे, सब कर चुका। लेकिन जब मैं 60 साल का हुआ तो मैंने ये सब छोड़ दिया। लोग मुझे इस उम्र में भी फिट होने पर कॉम्प्लीमेंट देते हैं तो मैं उन्हें भी ये सब छोड़ने की सलाह देता हूं। आज के दौर में मुझे सलमान खान और ऋतिक रोशन की फिटनेस बहुत अच्छी लगती है।
9 फिल्‍में और दांव पर 600 करोड़, अक्षय-अजय देवगन के लिए ईद पर सलमान का रिकॉर्ड तोड़ पाना लगभग नामुमकिन!
‘बिग बॉस देख रहे हैं’: गृह मंत्रालय के चप्पे-चप्पे पर अब तीसरी आंख से नजर
66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का ऐलान, अंधाधुन बेस्ट हिंदी फिल्म, आयुष्मान और विकी कौशल बेस्ट ऐक्टर
विवादित वीडियो मामला: मुश्किल में एजाज खान, कोर्ट ने 1 दिन की पुलिस कस्टडी में भेजा

राजस्थान


मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना राजस्थान सरकार की एक अहम पहल है, जिसमें 18 साल से कम उम्र के बच्चों को दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक मदद दी जाती है। इस योजना के तहत 56 दुर्लभ बिमारियों और 50 लाख रुपये तक बच्चों का इलाज मुफ्त कराया जाता है। साथ ही, जरूरी देखभाल के लिए हर महीने 5,000 रुपये की सहायता भी दी जाती है। यह योजना खासकर उन परिवारों के लिए है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते। सरकार का उद्देश्य ऐसे बच्चों को सही इलाज, देखभाल और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है ताकि उनका जीवन बेहतर हो सके और परिवार पर आर्थिक भार न पड़े। योजना का लाभ लेने के लिए बच्चे की उम्र 0 से 18 वर्ष के बीच होनी चाहिए और वह राजस्थान का मूल निवासी हो या फिर कम से कम तीन साल से राज्य में रह रहा हो। बीमारी की पुष्टि के लिए कम से कम दो सरकारी मान्यता प्राप्त अस्पतालों की रिपोर्ट जरूरी होती है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना क्या है यह योजना 18 वर्ष से कम उम्र के उन बच्चों के लिए है जो किसी दुर्लभ बीमारी से पीड़ित हैं। ऐसे बच्चों को इलाज के लिए सरकार की ओर से आर्थिक मदद, मुफ्त इलाज और हर महीने सहायता राशि दी जाती है। इलाज सिर्फ उन अस्पतालों में होगा जिन्हें राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने तय किया है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का उद्देश्य दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्चों को सही इलाज, देखभाल और जरूरी सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराना। परिवार को लगातार आर्थिक सहायता देकर बच्चों का इलाज रुकने न देना। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की विशेषताएं 18 साल से कम सभी बच्चों के लिए लागू। राजस्थान के निवासी या 3 साल से ज्यादा समय से राज्य में रहने वाले आवेदन कर सकते हैं। 50 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज। हर महीने 5,000 रुपये की आर्थिक सहायता। बच्चा अन्य योजनाओं का लाभ भी ले सकता है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की पात्रता बच्चा 18 वर्ष से कम उम्र का होना चाहिए। आवेदक राजस्थान का मूल निवासी हो या कम से कम 3 साल से यहां रह रहा हो। बीमारी का सर्टिफिकेशन AIIMS जोधपुर या जेके लोन अस्पताल जयपुर में होगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के अनुदान और आर्थिक सहायता की शर्तें इस योजना के लिए एक विशेष निधि बनाई गई है, जिसमें सरकारी राशि, दान और CSR की राशि रखी जाएगी। बच्चे को 50 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज दिया जाएगा। हर बच्चे को 5,000 रुपये प्रति माह सहायता दी जाएगी। पालनकर्ता बदलने की स्थिति में जिला कलेक्टर 3 महीने के अंदर नया पालनकर्ता तय करेगा। सहायता राशि तभी मिलेगी जब इलाज Centre of Excellence में हुआ हो। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के जरूरी दस्तावेज बीमारी की रिपोर्ट पालनकर्ता की अंडरटेकिंग बच्चे और पालनकर्ता का आधार कार्ड बैंक खाता विवरण मोबाइल नंबर मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का आवेदन कैसे होगा पालनकर्ता ई-मित्र या अपनी एसएसओ आईडी से ऑनलाइन आवेदन करेगा। आधार और जनाधार से जानकारी अपने आप पोर्टल पर आ जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की आवेदन के बाद क्या होगा आवेदन अपने जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO) के पास जाएगा। सही पाए जाने पर आवेदन AIIMS जोधपुर या JK लोन जयपुर भेज दिया जाएगा। बच्चे को जांच के लिए बुलाने की तारीख और समय SMS से मिलेगा। बीमारी प्रमाणित होने पर ऑनलाइन प्रमाणपत्र जारी होगा। इसके आधार पर पोर्टल खुद ही सहायता मंजूरी का आदेश जारी कर देगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का साल में एक बार वेरीफिकेशन कैसे होगा पालनकर्ता को हर साल नवंबर–दिसंबर में वेरीफिकेशन कराना जरूरी है। यह काम ई-मित्र या ब्लॉक/जिला कार्यालय में होता है। इस स्थिति में वेरीफिकेशन की जरूरत नहीं होगीः अगर नवंबर–दिसंबर में पालनकर्ता ने पेंशन या राशन का बायोमेट्रिक/OTP वेरीफिकेशन कराया हो, तो दोबारा वेरीफिकेशन की जरूरत नहीं है। अगर बच्चा 3 महीने में एक बार AIIMS या JK लोन की OPD या IPD में आया हो और रिपोर्ट पोर्टल पर अपडेट हो गई हो, तब भी अलग वेरीफिकेशन नहीं करना पड़ेगा। अगर पालनकर्ता या बच्चा शारीरिक रूप से असमर्थ है, तो अधिकारी घर आकर वेरीफिकेशन करेंगे। नोटः समय पर वेरीफिकेशन न कराने पर जनवरी से भुगतान रुक जाएगा, लेकिन वेरीफिकेशन होने के बाद पूरा एरियर मिल जाएगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना बंद होने की शर्तें दो स्थितियों में सहायता बंद हो जाएगी— बच्चा बीमारी से ठीक हो जाए। बच्चे की मृत्यु हो जाए। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में पालनकर्ता को बदलना अगर पालनकर्ता की मृत्यु हो जाए या वह बच्चे को छोड़ दे तो जिला कलेक्टर नया पालनकर्ता नियुक्त करेगा। नया पालनकर्ता परिवार में सबसे नजदीकी रिश्तेदार होगा। बच्चे का नाम नए पालनकर्ता के जनाधार में जोड़ना जरूरी है। अगर कोई राशि पहले से मंजूर है और बंटी नहीं है, तो वह नए पालनकर्ता को दे दी जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में पैसा कैसे मिलेगा (स्वीकृति और भुगतान) बीमारी प्रमाणित होने के बाद पोर्टल से ऑटोमेटिक मंजूरी जारी होगी। पैसा दुर्लभ बीमारी कोष से दिया जाएगा। हर महीने एक तय तारीख को DBT के माध्यम से पालनकर्ता के जनाधार लिंक्ड खाते में राशि भेजी जाएगी। ई-बिल, ई-साइन और IFMS सिस्टम पोर्टल से जुड़े रहेंगे। आवेदन, मंजूरी और भुगतान की हर जानकारी एसएमएस से भेजी जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की मॉनिटरिंग योजना की देखरेख और निगरानी राज्य स्तर पर आयुक्त/निदेशक सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के नोडल अधिकारी करेंगे। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के नियमों में छूट अगर किसी मामले में नियमों में ढील की जरूरत हो, तो इसका अधिकार विभाग के आयुक्त/निदेशक, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से होंगे। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत इन बिमारियों को कवर किया जाएगा यह सभी दुर्लभ रोग योजना के तहत कवरेज किए जाते हैं ताकि बच्चों को महंगे इलाज, दवाइयों और जरूरी देखभाल में आर्थिक सहायता मिल सके। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना से जुड़े अन्य सवाल (FAQs) यह योजना किन बच्चों के लिए है? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना 18 साल से कम उम्र के दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्चों के लिए। कहां इलाज होगा? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत AIIMS जोधपुर या JK लोन जयपुर जैसे केंद्रों में। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत मासिक सहायता कितनी है? 5,000 रुपये प्रति माह। क्या आय सीमा है ? नहीं, मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में कोई आय सीमा नहीं है। पालनकर्ता बदलने पर क्या होगा? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत जिला कलेक्टर नया पालनकर्ता तय करेगा और सहायता जारी रहेगी।
मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा की केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी से मुलाकात
भूपाल नोबल्स विश्वविद्यालय का द्वितीय दीक्षांत समारोह आयोजित
राजस्थान: इंग्लिश मीडियम स्कूल बंद होंगे ? संसदीय कार्य मंत्री ने बताया भजनलाल सरकार का प्लान
राजस्थान: इंग्लिश मीडियम स्कूल बंद होंगे ? संसदीय कार्य मंत्री ने बताया भजनलाल सरकार का प्लान

बहुत कुछ


मदन अरोड़ा.बिहार ने एक बार फिर भारतीय राजनीति को स्पष्ट संदेश दिया है. मतदाता अब किसी भी नकारात्मक प्रचार, जातीय जहर या हवाई वादों से प्रभावित होने वाला नहीं है. इस चुनाव में न केवल गठबंधन ध्वस्त हुआ, बल्कि वह पूरा आख्यान भी धराशायी हो गया जो महीनों तक ‘वोट चोरी’, ‘नरेंद्र सरेंडर’ और ‘हर परिवार को नौकरी’ के नारों पर टिका था. राहुल–तेजस्वी का नकारात्मक कैंपेन और बंटाधार की राजनीति कहावत है—जहां-जहां पाँव पड़े संतन के, तहां तहां बंटाधार. बिहार में यह कहावत राजनीतिक रूप से इस बार राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर सटीक बैठती दिखी. राहुल गांधी का पीएम मोदी के खिलाफ ‘वोट चोरी’ अभियान और ‘चोरी का पीएम’ जैसी भाषा न केवल मतदाताओं को अखरी, बल्कि इससे गठबंधन की विश्वसनीयता भी तार-तार हो गई. दूसरी ओर तेजस्वी यादव जो ताजपोशी के सपने देख रहे थे—राहुल गांधी के कटु और नकारात्मक प्रचार की वजह से खुद भी डूब गए. प्रधानमंत्री मोदी जिस “ऐतिहासिक प्रचण्ड जीत” का दावा कर रहे थे, बिहार के मतदाताओं ने उस पर भरोसा दिखाते हुए एनडीए को 2010 की तरह एक बार फिर प्रचण्ड बहुमत दे दिया. नीतीश–मोदी की जोड़ी राहुल–तेजस्वी पर भारी पड़ी. तेजस्वी के वादे हुए फेल तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों से लेकर हर परिवार को नौकरी, जनवरी से 30 हजार रुपये और दीदियों के लिए पैकेज जैसे बड़े वादे किए. लेकिन मतदाता समझ गया कि ये वादे ज़मीन से ज्यादा हवा में बने थे. इसके उलट नीतीश–मोदी सरकार द्वारा पहले से चल रहे महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों पर महिलाओं ने भरोसा दिखाया. * लगभग डेढ़ करोड़ ‘दीदियों’ ने तेजस्वी के वादों से प्रभावित होने के बजाय उस स्थिर नीति को प्राथमिकता दी जो उन्हें वर्षों में मिली थी. * महिला–युवा के नए एमवाई गठबंधन का जादू चला, और पारंपरिक मुस्लिम–यादव (एमवाई) समीकरण बिखर गया. एमवाई समीकरण की मौत: मुस्लिम–यादव वोट क्यों खिसके? महागठबंधन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल रही—मुस्लिम डिप्टी सीएम की घोषणा न करना. ओवैसी ने इसे भुनाते हुए खुलकर कहा कि गठबंधन “मुसलमानों को सिर्फ दरी बिछाने वाला” समझता है. यह बयान मुस्लिम वोटों के लिए निर्णायक साबित हुआ. इसी तरह यादवों के भीतर यह नाराज़गी गहराती गई कि सीएम और पार्टी अध्यक्ष पद पर लालू परिवार का एकाधिकार जारी है और यादव समाज केवल परिवारवादी राजनीति का उपकरण बनकर रह गया है. इस असंतोष का फायदा एनडीए को मिला. नक्सलवाद, सुरक्षा और एस आई आर का प्रभाव बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों में पिछले वर्षों में नक्सलवाद लगभग समाप्त हुआ है. नक्सली भय खत्म होने से वामपंथी दलों का प्रभाव टूटा और सुरक्षा को लेकर भाजपा के प्रति भरोसा मजबूत हुआ. उधर एस आई आर(वोटर सूची शुद्धिकरण) का अप्रत्यक्ष प्रभाव भी दिखा— घुसपैठियों के वोट कटने से गठबंधन के कोर वोट बैंक पर चोट पहुंची.इससे मुस्लिम बहुल इलाकों में एनडीए की पैठ मजबूत हुई. साथ ही दिल्ली में मतदान से एक दिन पहले हुए विस्फोट ने हिंदू मतदाताओं में सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा की, जिसका सीधा लाभ एनडीए को मिला. मोदी–योगी–शाह की तिकड़ी ने बदला खेल मोदी का राष्ट्रवाद, योगी की सनातनी हुंकार, और अमित शाह की जंगलराज की वापसी न होने देने की चेतावनी ने जमीन पर गहरी पकड़ बनाई. इनकी रैलियों में उमड़ा अभूतपूर्व जनसैलाब पहले ही संकेत दे चुका था कि हवा किस दिशा में बह रही है. गठबंधन की हार का सार महागठबंधन की करारी हार कई बातों का मिला-जुला परिणाम है— 1. वोट चोरी का नकारात्मक अभियान उल्टा पड़ा. 2. मुस्लिम डिप्टी सीएम घोषित न करने की भारी गलती हुई. 3. यादव वोटों का लालू परिवार के खिलाफ फिसलना. 4. ओवैसी द्वारा मुस्लिम मतदाताओं का खिंचाव. 5. एस आई आर से घुसपैठियों के वोट कटना. 6. नक्सलवाद पर सरकार की सफलता. 7. फर्जी वादे बनाम वास्तविक विकास. 8. मोदी–योगी–शाह की आक्रामक और प्रभावी चुनावी रणनीति. बिहार का संदेश: राष्ट्रवाद और विकास ही निर्णायक मुद्दे इस चुनाव ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि— * राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति में सर्वोच्च मुद्दा है. * सनातन पर चोट या तुष्टिकरण अब स्वीकार नहीं. * मतदाता जातियों में बंटने के प्रयास को अस्वीकार करता है. * घुसपैठिया संरक्षण की राजनीति नहीं चलेगी. * मतदाता जानता है कि किसने जमीन पर काम किया और किसने हवा में सपने बेचे. बिहार का जनादेश यह भी बताता है कि वोट बैंक की राजनीति का आख्यान टूट रहा है. मुसलमानों और यादवों दोनों ने दिखा दिया कि वे किसी भी परिवार या दल के बंधक नहीं हैं. विपक्ष अब क्या करेगा? हार के तुरंत बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया है. “बिहार में वोट चोरी नहीं—डकैती हुई है” जैसे बयान सामने आ रहे हैं. संभावना है कि विपक्ष— * हरियाणा के CM के पुराने बयान * पीएम मोदी का ‘ऐतिहासिक जीत’ वाला वक्तव्य * अमित शाह के 160 सीटों से ज्यादा सीटों के अनुमान को मिलाकर एक नया ‘वोट चोरी’ नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश करे. लेकिन इसमें सबसे बड़ा खतरा है—जनादेश का अपमान होगा.खासतौर पर जेन-ज़ी को उकसाकर सड़कों पर उतारने की कोशिश राजनीतिक स्थिति को अस्थिर कर सकती है. बिहार का यह परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भारतीय मतदाता की परिपक्वता और राजनीतिक जागरूकता का प्रमाण है. मतदाता अब स्पष्ट रूप से बता चुका है कि— * वह राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखता है. * बिना आधार वाले आरोपों को नहीं मानता. * हवा हवाई वादों के बजाय परिणाम देखता है. * और, सबसे बढ़कर, वह अब किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार से बरगलाने वाला नहीं है. राहुल–तेजस्वी महा गठबंधन का बिखरना इस बात का संकेत है कि परिवारवादी राजनीति, तुष्टिकरण और नकारात्मक प्रचार की राजनीति की उम्र अब समाप्ति पर है. विकास, सुरक्षा और स्थिरता की राजनीति ही भविष्य का रास्ता है और बिहार ने इस राह को एक बार फिर रोशनी दे दी है.यह चुनाव परिणाम अखिलेश यादव और ममता बनर्जी के लिए भी खतरे की घंटी है.
हवा में दुश्मन को सूंघकर मार गिराए, पाकिस्तानी ड्रोन के परखच्चे उड़ाने वाले देसी सुरक्षा कवच की एक एक बात जानिए
जंग से 'विश्व गुरु' नहीं बन सकता भारत, जम्मू और कश्मीर के मंत्री ने पहलगाम हमले का बताया यह समाधान
विदेशी श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहा महाकुंभ, यूएस-रूस और सेंट्रल एशिया के तीर्थ यात्रियों ने लगाई संगम में डुबकी
भारत बनेगा दुनिया का मैनपावर सप्लायर, बजट में मोदी सरकार रख देगी नींव

मौसम


देश विदेश


वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। हालांकि, भारत ने आधिकारिक रूप से इस दावे पर कोई टिप्पणी नहीं की है। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने समझौते की पुष्टि की है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दोनों देशों से बात की थी इसके बाद से माना जा रहा था कि दोनों देशों में शायद तनाव कम हो। ट्रंप ने क्या बताया? ट्रंप ने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा, " संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता में एक लंबी रात तक चली बातचीत के बाद, मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। दोनों देशों को सामान्य बुद्धि और महान बुद्धिमत्ता का उपयोग करने के लिए बधाई। इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद।" अमेरिकी विदेश मंत्री ने बताया कैसे हुई डील पिछले 48 घंटों में, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और मैंने वरिष्ठ भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ बातचीत की है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ, विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर, सेनाध्यक्ष असीम मुनीर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और असीम मलिक शामिल हैं। मुझे यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गई हैं तथा तटस्थ स्थल पर व्यापक मुद्दों पर वार्ता शुरू करने पर सहमत हो गई हैं। हम शांति का मार्ग चुनने में प्रधानमंत्री मोदी और शरीफ की बुद्धिमत्ता, विवेक और कूटनीति की सराहना करते हैं।
सिंधु समझौता रद्द होने से चमकेगी पंजाब की किस्मत, जम्मू-कश्मीर बन जाएगा भारत का पावर हाउस
मोदी की दो टूक:एक-एक आंसू का होगा हिसाब, गुनाहगारों की कल्पना से बड़ा हगा इंतकाम.
पीएम हाउस पर CCS की बैठक शुरू, पहलगाम हमले के आतंकियों को लेकर होगा बड़ा फैसला!
टिकट खरीदा, बच्चों के साथ किया सफर... PM मोदी ने किया 'नमो भारत' कॉर‍िडोर के दिल्ली रूट का उद्घाटन

ताजा खबर


taaja khabar...काला धनः भारत को स्विस बैंक में जमा भारतीयों के काले धन से जुड़ी पहली जानकारी मिली...SPG सिक्यॉरिटी पर केंद्र सख्त, विदेश दौरे पर भी ले जाना होगा सिक्यॉरिटी कवर, कांग्रेस बोली- निगरानी की कोशिश....खराब नहीं हुआ था इमरान का विमान, नाराज सऊदी प्रिंस ने बुला लिया था वापस ....करीबियों की उपेक्षा से नाराज हैं राहुल गांधी? ताजा घटनाक्रम और कुछ कांग्रेस नेता तो इसी तरफ इशारा कर रहे हैं....2 राज्यों के चुनाव से पहले राहुल गांधी गए कंबोडिया? पहले बैंकॉक जाने की थी खबर...2019 में चिकित्सा क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार का ऐलान, 3 वैज्ञानिकों को संयुक्त रूप से मिला...चीन सीमा पर तोपखाने की ताकत बढ़ा रहा भारत, अरुणाचल प्रदेश में तैनात करेगा अमेरिकी तोप....J-K: पुंछ में PAK ने की फायरिंग, सेना ने दिया मुंहतोड़ जवाब ...राफेल में मिसाइल लगाने वाली कंपनी बोली, ‘भारत को मिलेगी ऐसी ताकत जो कभी ना थी’ ..

Top News